Latest / Baba ji Vijay Vats / 3 Feb 25 - बाबा अगर मैं संबोधि के बाद भी संसार में वापिस आ गया तो? परमात्मा ने हमें बनाया ही क्यों?
Transcript
- 0:22इंद्रजीत कुमार, झारखंड से बाबा जी मैं क्षमा चाहता हूँ, मुझे ये
- 0:34सवाल समझ नहीं आता। और बार बार खटकता है।
- 0:43मैं अस्तित्व में आने से पहले क्या था जब अस्तित्व से पहले मेरे
- 0:53कोई प्रारब्ध थे या नहीं? जन्म लेने के लिए फिर प्रारब्धों
- 1:01में बचने के लिए ईश्वर ने मुझे जन्म क्यों दिया जब ऊंद समुद्र
- 1:13में समाकर समुद्र हो जाएगी? तब क्या उस बूंद का कोई अंश फिर
- 1:27से बूंद बनकर समुद्र से बाहर नहीं आएगा?
- 1:33आखिर ईश्वर की मौज क्या है? इंद्रजीत कुमार, झारखंड तो शुरू
- 1:55करें इसका जवाब। तुमने तो पहली हँसना शुरू कर
- 2:00दिया। सवाल बड़ा मजेदार है और जवाब उससे
- 2:10भी ज्यादा मजेदार है। बाबा मुझे एक बात सुना सकते हैं
- 2:24बाबा कहते जो पहला आदमी बनाया भगवान ने आदमी उसने पूछा भगवान
- 2:35से। भगवान तू ये जो बंदिशें लगा रहा
- 2:43है ये कनक मत खाना ये खजूर खा लेना ये वे मत करना, वो मत करना।
- 2:55अगर मेरी अपनी कोई स्वतंत्र इच्छा नहीं है तो फिर तुने मुझे बनाया
- 3:01है क्यों? तो इतना कह के बाप ताली बजा के
- 3:11हंसने लगा है खूब हँसे। कहते हो प्रश्न सुन के भगवान गायब
- 3:23ही हो गए, उसके बाद किसी ने कही देखे ही नहीं।
- 3:31अब कृष्ण का जवाब भी क्या देते हैं?
- 3:34प्रश्न ही ऐसा अटपटा है। कहता तुने मुझे बनाया क्यों और
- 3:43बनाया तुझे बंदी से क्यों कनक मत खाओ, खजूर खाओ ये करो वो करो।
- 4:01तभी से भगवान गायब हैं और तभी से अंदाजे लग रहे हैं।
- 4:11कोई कहता वो हनुमान जैसा है, कोई कहता वो ब्रह्मा जैसा है।
- 4:20कोई विष्णु, कोई शंकर, कोई कहता नहीं, नहीं अल्लाह है, अरे नहीं,
- 4:27वह है गुरु सप्तम हैं, इन दासी लग रहे हैं।
- 4:38अंदर मंदर मोहरत तोरी फिर भी न देखें सोरत तोरी?
- 4:57मन्दर मन्दर मूरत तोरी फिर भी न देखी सूरत तोरी युग बीते।
- 5:13कब आये मिलन के युग बीते कब आये मिलान के?
- 5:28ओरणमशीर दरसन दो घनशार्थ हमारी बखिया प्यासी।
- 5:47हीरे मन मंदिर में चौत जलाले घट घटवा सीर।
- 6:06क्यों बनाया उसने? बड़ा पिचीदा सवाल है और सच कहूं
- 6:15तो बड़ा वाजिब सवाल है, कौन जाने मुक्त होने के बाद?
- 6:25संबोधि प्राप्त होने के बाद कोई बूंद उछल के बाहर आ जाए और फिर
- 6:33संसार में आ जाए फिर फिर यही कपड़ा गफी 84 ला क्यों नहीं?
- 6:46बड़ा भटकाव है। क्या किया जाए?
- 6:54गलती से एक बार मेरे पास आती है क्या मेरा शिष्य मुझे उस्ताद जी
- 7:00का हक रहता था उस्ताद जी? ये भगवान ने सृष्टि बनाई क्यों?
- 7:13मैंने कहा तुने सृष्टि से क्या लेना?
- 7:16चलो छोड़ो मुझे कोई जन्म दिया, मैंने कहा अपने बाप से पूछा।
- 7:28पूछा था उससे तो फिर उसने क्या कहा?
- 7:34उसने उस्ताझी जवाब टेढ़ा दे दिया। क्या वो कहता है मैंने कब बनाया?
- 7:42चोर छोड़ मैं बन गया? क्योंकि प्रेप्लांड थोड़ी था, अब
- 7:51बन गया तो बन गया बेचारा दुखी था। दुखी व्यक्ति ही ऐसा प्रश्न पूछा
- 8:00करते हैं अन्यथा। मेज के ऊपर अंगरों की बेटी पढ़ी
- 8:07हो तो कोई एनालिसिस थोड़ा किया करता है।
- 8:17कहाँ से बनी कौन सी फैक्टरी से बनी?
- 8:24मेज के ऊपर पड़ी हो, अंगूरों की बेटी तो कोई पूछता है कि कैसे बन
- 8:30किसने बनाई? कौन कौन सी प्रोसेसिंग हुई?
- 8:34बस गट कली जाती है। जीसको गटकने का मज़ा पता है वो
- 8:43सवाल नहीं पूछा करता ईश्वर ने मुझे क्यों बनाया कहता, मैंने कहा
- 8:57देख बात सुन अच्छी लगी, कहता नहीं।
- 9:04मैंने कहा ऐसा कर पीछे से का दरवाजा निकलता है हाँ और वहाँ से
- 9:11निकल जा तुझे कौन कहता है अरे बना दिया जिसने उसका धन्यवाद नहीं
- 9:20देता। और अच्छा नहीं लगता तो पिछले
- 9:24दरवाजे से खस के जाओ। यह भी तो एक ऑप्शन है तो बाबा यह
- 9:34कुछ कुछ खींचती भी है, अच्छी भी लगती है।
- 9:41और बुरी भी लगती है। जब कभी अच्छी लगती है तो जी करता
- 9:45है कि लाख साल जी लूँ और जब अच्छी नहीं लगती तो जी करता है कि जी
- 9:54मैंने कहा ये तेरी सरदर्दी है। अब तू फैसला करके आना मेरे पास पर
- 9:58वो कभी नहीं आया। छों बराबर छों शराबी छों बराबर
- 10:10छों झों बराबर छों शराबी छों बराबर काली घाटा है।
- 10:24मस्त मज़ा है, काली घटा है, मस्त मज़ा है, उठाकर खूं खूं खूं झों
- 10:35बराबर झों शराबी झों बराबर झों। झुम बराबर झुम शरा काली घटा है,
- 10:50मस्त मज़ा है, काली घटा है, मस्त मज़ा है।
- 10:58जाम उठाकर घोंघोंघों शराबी। एक पानी की बूंद पैदा करने की
- 11:17कैपेसिटी न रखने वाला मानव। ऐसे ऐसे प्रश्न की आकर्ता है जब
- 11:31इंद्रजीत कुमार कुछ बना नहीं सकते हैं।
- 11:37झारखंड से हैं, झारखंड के लोगों को ऐसे भी सयाने होते हैं।
- 11:48और नहीं तो ये पसंद मेरी खोपड़ी घूम के हद हो गई।
- 11:59ये तो नई बात ही सुनी कि संबोधि को भी चलो प्राप्त हो जाए।
- 12:06और समुद्र में से न जाने कौन सी एक बूँध उछल के वीर संसार में
- 12:10आजा। दुखी व्यक्ति ऐसे प्रश्न पूछा
- 12:18करते हैं जो मस्त हवाओं में उतर गया, जिसने वो मस्ती की शराब पी
- 12:28ली। ऐसे प्रश्न तो दूर तलक उसके जहन
- 12:35में नहीं आते हैं। पाश ही कोई दुखी व्यक्ति होगा
- 12:43जिसने ये प्रश्न किया अभी अभी मेरा चैनल ज्वॉइन किया है।
- 12:48मुझको ठीक से सुनो भी शायद न हो, लेकिन सुनो तो गुनाह नहीं मैं
- 12:57कहता क्या हूँ उसे गुनाह नहीं उसके भीतर उतरा नहीं।
- 13:08मेरे शब्दों की रंगत उसके भीतर उत्तरी नहीं, ये मस्त बोल ये
- 13:20श्राव से ओत प्रोत लिप्त हुए हुए शब्द।
- 13:31लिबुड़ शेवड़ के आते हुए ये वाणी के साथ आनंद का वो शायद इसने पिया
- 13:40नहीं आपका अन्यथा कौन पूछता है क्यों बनाया?
- 13:53बड़ा ढीठ सवाल है अति खोपड़ीधारी लोग ऐसा प्रश्न पूछ सकते हैं और
- 14:02सुनिए मेरी बात अगर ऐसे प्रश्न तुम्हारे दिमाग में आने शुरू हो
- 14:07जाए तो समझ लेना। कि तुम्हें जीने का सिलिकन आया
- 14:26जीने वाले तुझे जीने का सिलिकन आया जीने वाले तुझे जीने का
- 14:34सिलिकन आया? ज़िन्दगी जीने के लिए है ना की
- 14:38थर्राने के लिए हर घड़ी तुम थर्राते रहते हो, कहीं ऐसा न हो
- 14:45जाए राधे बांधता हूँ सोचता हूँ छोड़ देता हूँ।
- 14:57कहीं ऐसा न हो जाए, कहीं ऐसा न हो जाए।
- 15:06थर्राती हुई यह दुनिया में चैन कहा।
- 15:12जलती हुई इस दुनिया में चैन का और जलती हुई इस आग में तुम बैठे हुए
- 15:22लोग प्रश्न ऐसे ही पूछ सकते हैं। यह कोई विडंबण नहीं है।
- 15:32तुम्हारे हृदय से ऐसे तूफान से युक्त ज्वालाओं से युक्त प्रश्न
- 15:36हैं, तो कोई हैरानी जनक है, विस्मजनक बात नहीं है।
- 15:46क्योंकि तुम्हें पीने का सिलिका लाया तुम्हें शस्त्र पड़े होंगे
- 15:52तुम इन गपोरियों के पीछे लगे होगे, तुम स्वर्ग और नरक की
- 15:58कल्पना से युक्त। खोपड़ी से सुना होगा सबको इसलिए
- 16:08संत को भी तुमने खोपड़ी से सुना होगा, मैंने कल ही के भरोसे में
- 16:14बताया। कि जीने का सिलिका रहस्यमय आता है
- 16:27और रहस्य खोपड़ी से पार है, तुम खोपड़ी में उलझे उलझे ऐसे
- 16:33प्रश्नों का जवाब प्रश्न से उत्तर उत्तर से प्रश्न प्रश्न से उत्तर।
- 16:40उत्तर से प्रश्न खोपड़ी खुद का जंजाल है।
- 16:49बिल्कुल मकड़ी के जाल की तरह अपने ही अर्धगर्द जाल गुन लेती है,
- 16:53मकड़ी फिर उसमें फंस जाती है। बस ऐसी ही तुम्हारी खोपड़ी है।
- 17:02ये खोपड़ी के न्यूरॉन्स मकड़ी की तरह जला बुन लेते हैं और तुम
- 17:09उसमें फंस के रह जाते हो, निकल नहीं सकते पर मकड़ी उसके भीतर ही
- 17:13मर जाती है। बस ऐसे ही तुम प्राण त्याग देते
- 17:16हो। तुमने कभी उस अंगूर की बेटी का
- 17:28स्वाद नहीं चखा और ये बड़ी दुखद बात है।
- 17:40और तुम्हारे गुरुजन तो कहते हैं पी भी मत लेना।
- 17:44अन्यथा डेरे में मत आया। एक व्यक्ति मेरे पास आ गया।
- 17:52कहता है मैं गुरु को छोड़ना चाहता हूँ।
- 17:56मैंने कहा कौन से संप्रदाय से हूँ यह संप्रदाय बता दिया।
- 18:03मैंने कहा सीधा सा रास्ता है क्या रास्ता है, ठेके पे जाओ, पुआ ले
- 18:10लो, पी लो, बस धर्म छूट गया जाओगे, किस मुख से छोटी छोटी
- 18:21बासों से तुम्हारे धर्म बंदे हैं। इन्हें तुम धर्म कहते हो तुटकी
- 18:29तड़क कर के लाई बे कतरा न लिया बस इसे तुम शराब इतना सा न सा।
- 18:43तुम बार बार ही ये काम चलाते रहते हो और कमाल की बात है।
- 18:51मकान का मालिक मकान में कभी प्रवेश नहीं किया।
- 18:57मकान का मालिक मकान के वितर जाकर देखता नहीं।
- 19:02मकान भीतर से कैसा है, क्या कुछ है इसमें?
- 19:08बाहर के मकानों को तो अब 1010 बार खंगाल लेते हो, लेकिन अपने ही
- 19:15मकान को वितर से खंगाला नहीं तुमने और अगर खंगाल लिए होते।
- 19:23तो तुम्हें तुम्हें तुम मिल जाते हैं सुकून आ जाता शुरू आ जाता
- 19:34आनंद की वो मौज मस्ती बहार वो ठंडी मीठी।
- 19:41पुलकित करने वाली हवाएं तुम्हारे नासा पुटों से तुम्हारे प्राणों
- 19:46में प्रवेश कर जाता हूँ। काश ऐसा हो सकता है अवश्य ही
- 19:57तुमने। इन टोपी धारियों को सुना होगा, जो
- 20:08कहते हैं हम राष्ट्र बनाएंगे। कमल की बात है, राष्ट्र बनाने से
- 20:19क्या होगा? सभी धर्मों ने अपने अपने राष्ट्र
- 20:24बना लिया। क्या तुम भी इतने बुद्धू हो?
- 20:32हमारे सनातन का भूषण थे शुबाशु धैव कुटुम्बकम।
- 20:38मूर्खों ने तो तोड़ दिया क्या तुम भी तोड़ोगे अपने ही रिश्यों की
- 20:43बनाई हुई इस संपदा को सारी वसुधा एक पर बार है।
- 20:57राष्ट्र बनाना है या जीने का सलीका सीखना है?
- 21:04इन दोनों में से एक राह चुनना होगा।
- 21:10राष्ट्र जिन्होंने बना लिया उनको जीने का सलीका न आया।
- 21:16आज भी वो लड़ रहे हैं। मनुष्य को लड़ने के लिए कुछ ना
- 21:22कुछ चाहिए और कुछ ना मिलेगा तो मुसलमान मुसलमान से लड़ेगा।
- 21:31सिया सुन्नी से लड़ेगा। जैन धर्म के तथा कथित अहिंसक लोग
- 21:38श्वेताम्बर दिगंबर से लड़ेंगे और हाथ में पटकी होगी।
- 21:45अहिंसा परमो धर्मा कमाल का धर्म है।
- 21:53यह थोड़ी सी आहट से टूट जाता है। आज तुमने ऐसा मानव बना दिया है
- 22:07जैसे रिपोर्ट होता है धीरे धीरे धीरे धीरे चलता है पता चल जाता है
- 22:13यह कृत्रिम है। कहाँ मानव की वो मस्तानी चाल और
- 22:21कहाँ रोबोट की वह बनाई हुई है प्रतिष्ठित कई हुई चाल।
- 22:38बिल्कुल मुर्दी जैसी लगती है, है भी मुर्दा जो किसी के हाथ की
- 22:44कुठपुतली बन के नाचे वो उसे जीमित थोड़े ही कहते हैं।
- 22:51वो मृदा ही होता है तुम्हारे धर्मों ने।
- 22:57तुम्हें कमेनमेंट सखाएं तुम्हारे धर्मों ने कभी भी नहीं सखाया कि
- 23:06अपने मालिक खुद बनो। कहीं बुद्धा आए तो प्रथम बार
- 23:15उन्होंने सन्देश दिया। अप दीपो भवा अपने मालिक खुद बनाओ
- 23:24दूसरों को अपना मालिक नंबर नहीं दो, न किसी शास्त्र को, न किसी
- 23:29विद्युत जन को, न किसी शंकराचार्य को।
- 23:35अपना मालिक ना बनने दो, अब तो दीपो भवा लेकिन यहाँ दोगले लोग
- 23:43हैं। बाहर जाएंगे तो कहेंगे मैं बुद्ध
- 23:48के राष्ट्र से आया हूँ और अपने राष्ट्र में आएँगे तो बुद्ध को
- 23:53गाली निकालेंगे। ऐसे ऐसे प्रश्न पूछने वाले लोग
- 24:08मुझे बड़ी व्यथा होती है। इनके जिगरे हालात देख कर हर बात
- 24:25पे रोना आता है। तुम मूर्ति पूजक तो हो, लेकिन
- 24:40मूर्ति पूजा का भीतर की क्रोनोलॉजी तुम समझ नहीं सके।
- 24:43आज तक बस ये वही करोना लॉजिक थी जो अष्टमक ने बताई।
- 24:54अति में भोग लो और अति में भोगने से भोगने की इच्छा खत्म हो जाएगी।
- 25:01बड़ी उलट बात लगेंगी। खोपड़ी को खोपड़ी कहेगी मैं तो
- 25:06एडिक्टेड हो जाऊंगा, उसका तर्क ठीक है।
- 25:12लेकिन जीवन में तर्क कहाँ काम आते हैं?
- 25:16जीवन में तर्क काम नहीं आते हैं। अष्टावक्र कहते हैं इतना भोगो के
- 25:32भोगने से व्रत किया जाए क्योंकि भोग में दुख है।
- 25:40यही कहते हैं बुद्ध क्या नहीं था? उनके पास भोगने को क्यों छोड़ के
- 25:46चले आये? भोग से ऊब पैदा होती है।
- 25:56तुम भोगने की तमन्ना तभी तक करते हो, जब तक तुम्हें भोगने से ऊब
- 26:02नहीं आती, तुम स्वर्ग की तमन्ना भी तब तक करते हो 1 दिन ऐसे आएगा
- 26:11जब तुम स्वर्ग से भी भागोगे। मैंने सुना है एक संत मरकर ऊपर
- 26:24चला गया, लाइन में लगा उसकी डर न तो यमराज कहने लगे तुम तुम तो
- 26:34सर्क में जाओ। तुम्हारा खाता कलौज हो गया तो
- 26:41स्वर्ग में आनंद भोगो, संत कहने लगा हाथ जोड़ के महाराज कृपा करो
- 26:52क्यों? सौगियों तो बड़ी ऊप है।
- 26:57प्रत्येक व्यक्ति अपने अपने स्थान आसन में बैठा है और प्रत्येक
- 27:02व्यक्ति के सर के ऊपर कल्पवृक्ष है, हाथ में माला है, राधे राधे
- 27:08झपरा है। बड़ी ऊप पैदा होती है।
- 27:13मैं तो उठ गया बाड़ में जाये तुम्हारा सर कसा तो फिर बस एक बार
- 27:21नर्क भेज दो। अरे नर्क भेज दो वो भी तो देख लो।
- 27:32जिसके तुम इतने गुण गान किए थे वहाँ यह है, वहाँ यह है, उर्वशी
- 27:40है, रंबा है, मेनका है नाचती हैं, सब देख लिया, सब देख लिया और
- 27:50उगाड़ उगाड़ के देख लिया। और पाया के दुर्गंध के सिवा और
- 27:56कुछ नहीं। इसलिए भागा अन्यथा स्वर्ग तो
- 28:05तुमने मेरी नियति में कब से लिख दिया था?
- 28:11मैं जो मांगता आ जाता है, जो इच्छा होती खाने की आ जाता,
- 28:19मांगते ही आ जाता कल्पवृक्षी होता है, लेकिन मैं तो ऊब के आरा देरा
- 28:28दे कर ना से। यौविका जीवन ये किस हरामी ने फंसा
- 28:35दिया मुझे तुम हिन्दुओं की फैलास्फी को समझे नहीं सनातन की
- 28:43बड़ी शानदार सी रस्फी है तुमने इसकी भीतरी करो ना।
- 28:47लोधी को जाना है। इतना पूजो पत्थर को कि पत्थर में
- 28:56भगवान नहीं ये पता चल जाए कि पत्थर में कुछ नहीं मिलता पत्थर
- 29:03जड़ है, मूर्ति जड़ है। और जीस दिन तुम्हें पता चल गया अब
- 29:08लोग कहते हैं धन्ना ने पत्थर में से पा लिया, बिल्कुल पा लिया।
- 29:15बिल्कुल ऐसे ही पा लिया जैसे तुम कौड़ियों के ऊपर सीढ़ियों के ऊपर
- 29:19चढ़ते हो और छत पे पहुँच जाते हो। लेकिन छत पर पहुंचने के लिए
- 29:31सीढ़ियों काम तो आईं, लेकिन सीढ़ियों को त्यागना भी पड़ा।
- 29:40सीढ़ियों पे पांव भी रखा। और पांव रखकर उन्हें छोड़ना भी
- 29:46पड़ा। अगली सीढ़ी पर पांव जमाना पड़ा
- 29:51फिर उसको भी छोड़ना पड़ा। अंततः एक एक करके सभी पोड़ियाँ
- 29:55छूट गई और 1 दिन छत आ गई जहाँ कोई पोड़ी नहीं बिछड़ना कहो, सर्वोच्च
- 30:01उचाई आ गई। वो आ गया सह श्रद्धालु कमल, वो आ
- 30:05गया सच घंटा अव से ऊपर जाने का कोई न स्थान है न रास्ता है।
- 30:16पत्थर की मूर्तियाँ तो मैं मुक्त तो कराती हैं, लेकिन सीढ़ियों की
- 30:21तरह कराती हैं। पत्थर की मूर्तियों से शुरू करना
- 30:25लेकिन पत्थर की मूर्तियों में कुछ नहीं है।
- 30:29यह जानकर उसे छोड़ भी जाना राधे राधे करने से शुरू कर लेना, राम
- 30:36राम करने से शुरू कर लेना। लेकिन जाप में कुछ नहीं है।
- 30:41रेपुटेशन में कुछ नहीं है। बोरिंग है ओनली बोरिंग, समय की
- 30:48बर्बादी, शक्ति की बर्बादी और व्यर्थ समझ के उसको छोड़ भी देना
- 30:53है। अगर तुम्हें जाप की व्यर्थता अब
- 30:56तक सिद्ध नहीं हुई तो जापते जाना। मैं सदा यही कहता हूँ जहाँ हो उठ
- 31:02के रहो, ऐसे नहीं कहता रोज़ मेरे पास लोग आते हैं बाबा अंगूठा लगा
- 31:10दो, लगा दूंगा तुम दीक्षा दे दो नहीं, ये मुश्किल है क्यों?
- 31:19अपने पास बिठालो तुम्हारे भीतर ही तो बैठो, उतर के देखो।
- 31:40कहाँ जाएगा जहाँ जाइएगा, हमें आएगा।
- 32:02कहाँ जाओगे मेरी तरफ भागने वालो अपने भीतर भाग के देख लो मिल
- 32:14जाएगा मेरे पास। आने में तो भागमभाग बहुत होगी,
- 32:24बड़ी ही मशक्कत करनी पड़ेगी। बड़ी यात्रा करनी पड़ेगी।
- 32:36बाहर भागने वालो, थोड़ा भीतर भाग के देख लो, एक बार कभी भाग के
- 32:40देखा नहीं तुमने मैं जानता हूँ। अगर एक बार भी बाहर भागने की
- 32:48कवायद को छोड़कर भीतर भागना शुरू कर दो तो मेरे पास आने की तमन्ना
- 32:54समाप्त हो जाएगी। फजी रूठकर अब कहाँ जाइएगा जहाँ
- 33:09जाइएगा हमें। आएगा।
- 33:18अजय ही रूठकर? कहीं चले जाओ अपने भीतर जब तक
- 33:29नहीं उतरोगे मुझे नहीं पाओगे। यहाँ आ जाओ, बिलकुल आ जाओ,
- 33:38सीढ़ियों का इस्तेमाल करो लेकिन सीढ़ियाँ छोड़नी पड़ती हैं।
- 33:43ये भी मैंने पहले कहा आ जाओ देख लो मस्ताने कैसे हुआ करते हैं ना
- 33:51कोई चाहत होती है। न कोई राहत का ढंग होता है बस पिए
- 33:59ही चले जाते हैं। दिन भर रात मस्ताने कैसे होते
- 34:06हैं, ये देख लो। मस्ताने होते भी हैं, करने होते
- 34:09हैं। तुम कहते हो परमात्मा है, मैं
- 34:15तुम्हें कहता हूँ थोड़ा मेरे पास आके देख लो, मेरे दायरे में थोड़ा
- 34:21आके देखो इस पहलू में थोड़ी देर। इस दायरे में थोड़ी देर रुक के
- 34:31देखो, लेकिन यहाँ रोक मत जाना, ये सिर्फ तुम्हें सिखाने के लिए है।
- 34:39मूर्तियों की तरह अंततः तो अपने ही भीतर उतरना पड़ेगा।
- 34:51सीढ़ियों का सहारा तो ले लो लेकिन सीढ़ियों से पार होने के लिए है
- 34:59सभी सीढ़ियों का सहारा वो इसलिए अस्तव क्या कहते हैं भोगो, भोगो?
- 35:08और भोग छूट जाएंगे 1 दिन स्वर्ग में भी ऊब होती है भला, ज़रा सोचो
- 35:19अगर ऐसा हो जाए तो तुम भागो नींद तो और क्या करोगे?
- 35:27जो मांगो वही मिल जाएगा तो फिर क्या करोगे यह तो तुम्हें मिलता
- 35:37नहीं? इतनी मुशक्कत के बाद तुम्हारे
- 35:38कॉम्पिटिटर बहुत हैं, भारी मुकाबला है।
- 35:46अगर जन्मते ही तुम्हें आई ए एस बना दिया जाए तो इतनी खलासी
- 35:51लगेंगी पर ये दृष्टि नहीं चलेगी अगर सब कुछ तुम्हें मिल जाए,
- 36:01बैठें पटाएं। व्यर्थ हो जाता है बेकार हो जाता
- 36:08है स्वाद आता है लड़ने में तूफानों से तूफानों से टकराने में
- 36:17आनंद रश आता है। और जितना टकरा के तूफानों से तुम
- 36:24चीज़ को पाते हो उतना ही राश आता है।
- 36:31ऐसे ही नहीं पाया है मुफ्त नहीं पाया है तूफानों से टकरा के पाया
- 36:38है। तो ठीक किया ब्रह्मत्व ने के
- 36:47सृष्टि बना दिए, लेकिन अगर सृष्टि न बनाता और तुम भीतर उतरते और उस
- 36:58कल्पवृक्ष के पास चले जाते। फिर जो मांगते मिल जाता तो ज़रा
- 37:03सोचो कितनी देर जीता जीने की इच्छा कितने दिन रहती तुरंत भाग
- 37:19जाते तुम कहते। बा जाए।
- 37:24इस महोब्बत से उठा लो पान लाना अपना सनातन ने बड़ी शानदार खोज की
- 37:37थी। जीस चीज़ को पाना है उसकी विरोधी
- 37:42चीज़ को अच्छी तरह से भोग लो। उसको अच्छी तरह से देख लो देखा।
- 37:50जब अच्छी तरह से तुम देख लोगे तो मुक्त हो जाओगे, तुम्हें भोगने से
- 37:57डर लगता है, फिर कभी ऐसा नहीं होगा क्या कि समुद्र में से एक
- 38:04बूंद उड़कर फिर संसार में जाए। बड़ी घबराहट होती है।
- 38:13तुमने ठीक से पी नहीं पुत्र तुमने ठीक से पी नहीं या तुम्हें ठीक से
- 38:22पिलाने वाला कोई मिला नहीं। अन्यथा तुम ऐसे प्रश्न पूछने के
- 38:29बजाए तुम हाथ में जान लेके घूम रहे हो।
- 38:43झों बराबर झों शराबी झों बराबर? छों बराबर झूं शराबी छों बराबर
- 38:56झूं काली घटा है, मस्त फजा है, काली घटा है, मस्त फजा है।
- 39:11जाम। उठाके झों झों झों बराबर झों
- 39:19शराबी झों बराबर ज़िन्दगी। तर्क के लिए नहीं है।
- 39:29इसलिए संत रोज़ कहते हैं तुमसे बुद्धि अर्चना, बुद्धि गागर में
- 39:38सागर को समा लेना चाहती है और देखिए मैं भी तुम्हें रोज़ कहता
- 39:46हूँ। तुम में इतनी हैसीयत नहीं कि तुम
- 39:51एक पानी की बूंद बना सको, एक ज़रा रेत का बना सको जैसे तुम घटिया से
- 39:59घटिया कहते हो, माटी हो गया माटी का ज़रा बना सको ये तुम में शक्ति
- 40:05नहीं है। और तुम तर्क इतने बड़े करते हो,
- 40:12ये किस दुष्ट ने सिखाया तुम्हें, जिन्होंने तुम्हें जीने नहीं
- 40:19दिया, जिन्होंने तुम्हें जीने का वर नहीं सिखाया?
- 40:23उन दुष्टों में खोपड़े में उलझती है ये पुराण और ये पुराण पंथियों
- 40:34ने जीने का तरीका सलीका छीन लिया तुमसे ये कोई तरीका नहीं है।
- 40:48ऐसी बातें तो पागल खाने में बंद पागल किया करते हैं, किसी दुष्ट
- 41:00ने सनातन को नजर लगाती है, जो इतना शानदार सनातन का मर्म छीन
- 41:13लिया उसने। विकृत कर दिया सब कुछ आए थे सवाल
- 41:29पे सवाल भागने लगा है ज़िन्दगी मिली थी जीने के लिए आए।
- 41:38अंगारों की बेटी पीने के लिए और तुमने उसके एनालिसिस करने शुरू कर
- 41:46दिया है। इस तरफ दुष्टों की बात है।
- 41:54जो भीतर नहीं गए उन्हें जवाब नहीं पता वो तुम्हें कोरे शब्दों में
- 41:59लफाज़ी में उलझा देना चाहता हूँ बात तो सीधी साफ सरल है ये मक्का
- 42:15मदीना ये तीर्थ यात्राएं। ये कुंभ ये पर्याप्त या हरिद्वार
- 42:30सब बकवास है। मेरे पास सभी जगह से लोग आते हैं।
- 42:39और सही बताऊँ तो इन तीर्थों से ज्यादा आते हैं और आने भी चाहिए
- 42:45क्यों? क्योंकि जिसने मज़ा चख लिया वो तो
- 42:52नहीं आएगा। और जिसने तर्क के निकाल के रस
- 42:57निकाल लिया है कि नहीं है। तीर्थों में तीर्थों में रहने
- 43:02वाले अक्सर लोग आनंद की तलाश में भागते हैं।
- 43:07कहीं और तो नहीं और सही और नहीं और सही।
- 43:14तू अगर है हरजाई तो अपना भी यही दोष रहे, हम भी बदलेंगे स्थान को,
- 43:23वह भी तीर्थ से मैदान में आ जाते हैं, कभी किसी को तीर्थों पे मिला
- 43:32है, तीर्थों पे नहीं मिलता। क्योंकि तीर्थ हमारे बनाए हुए
- 43:41नकली हैं। तीर्थनावां जयत्य सब बिन पाणे की,
- 43:47नाई गर्मी तीर्थ पे जाना चाहते हो तो उसके बाणे में रह लो।
- 43:56नहा लोगे बाहर भीतर दोनों से निर्मल हो जाओगे, उसके भाड़े में
- 44:07रहो, उसकी मर्जी में रहो। यही कहते थे लव से।
- 44:18लव से कहते हैं वो जो करता है ठीक करता है और भले के लिए करता है लव
- 44:27से ने जीके देख लिया है सब पद्धतियां बेकार।
- 44:33और बाबा ने भी सब पद्धतियां देख ली हैं।
- 44:37ज़ोर न झुगती छोटे संसार कोई भी जुक्त कर लो तो संसार के बंधन से
- 44:44छूट नहीं सकोगे और संसार वास्तव में बंधन है ही।
- 44:53यही झगड़ा है तुम्हारे दिमागों में, संसार बंधन है कहाँ यहाँ पीओ
- 45:03और जियो कहाँ बंधन है कहीं बंधन देखा तुमने?
- 45:11कोई आचार्य कहते हैं शादी बंधन है, कहाँ बंधन है बताओ तुम्हारी
- 45:21सामाजिक रचना में बंधन है, शादी में बंधन है, शादी में तो कबीर भी
- 45:28करते हैं। नानक भी करते हैं, कोई बंधन नहीं
- 45:32होता। लोई और कबीर ऐसे रहते हैं जैसे
- 45:40हिरण झा जैसे लैला सीरी फरे हाथ तुम वैसे रह नहीं पाते तो मैं
- 45:49जीने का सिलिकन हूँ। जीस दिन अपने मैं को छोड़ना सीखना
- 45:59उस दिन कोई भी चीज़ तुम्हारे लिए बंधन नहीं होगी, ना शादी नाम रखते
- 46:06हो जिनसे तुम इतना डरते हो शादी बंधन।
- 46:10मृत्यु से वह भी तो कारण कारण तुम्हारा मैं बंधन मैंमी है शादी
- 46:20में नहीं बंधन मैंमी है, मृत्यु में नहीं।
- 46:30मृत्यु की तरफ उन्मक होने को तो गोरख कहते हैं मरो मरो हे जोगी
- 46:40मरो मरो मरण है मिठ। देखिये एक छोटी सी बात आपकी समझ
- 46:48में रोज़ प्रश्न पे प्रश्न उठा देता हूँ ऐसे कौन से शास्त्र
- 46:54पढ़ते हो तुम किस मूर्ख की रचनाएँ तुमने पढ़ ली हैं कौन से कुएं का
- 47:05जल तुमने पी लिया है? जो तुम पागल हो गया बात तो
- 47:13बिल्कुल सीधी साफ है। अष्टवकर कहते हैं अपने पास
- 47:20पहुंचना है क्या करोगे? अपने पास पहुंचने के लिए कोई
- 47:28यात्रा थोड़ी करनी पड़ती है। अब मेरे पास लोग आ जाते हैं।
- 47:35मैं कहा आगे से मत आया करो क्यों बाबा आने का पुण्य मिलता रहेगा?
- 47:46मैं उन्हें क्या समझाऊं? मैंने कहीं जाके पायल है जहाँ गया
- 47:54था वहाँ से बाबा ने वापस भेज दिया जाओ यह नहीं मिलेगा, यहाँ तो
- 48:00दुष्ट बैठे हैं। हरिद्वार के आगे ऋषिकेश जनता।
- 48:04मेरी बायोग्राफी में पढ़ो, बाबा बोले वापस चले जाओ, नहीं मिलेगा
- 48:14तुम्हें यहाँ सब लुटेरे बैठे हैं तुम्हें जो वास्तव में जिज्ञासु
- 48:21लगते हो। छोटी सी उमर मात्र 20 वर्ष का
- 48:331973 का वो दिन 3 जनवरी भयानक ठंड।
- 48:41रात्रि का वेला शरीर पे पोसा कोई नहीं दो पैंटें पैंट से ऊपर पैंट
- 48:49सर्दी न लगाए और बनियान और शर्ट सिर पर गोली बंद पैरों में बूट।
- 49:02ये कुल सामान ये कुल संपत्ति मेरी थी और लश्कर जंक्शन पर बाबा ने
- 49:10मुझे कहा वापस चले जाओ वो गाड़ी सामने खड़ी है तो मैं टिकट ले
- 49:14लेता हूँ, तुम जाओ वापस नहीं मिलेगा यहाँ मैं रोज़ आता हूँ
- 49:18रोज़ जाता हूँ मेरा। मेरा काम ही ये है यहाँ लुटेरे
- 49:24बैठे हैं, ठग बैठे हैं तुम भोले हो, मासूम दखते हो चले जाओ यहाँ
- 49:30से। लेकिन मैं बाज़ ईद रहा हूँ बाज़
- 49:36ईद रहा तो उनकी रीला काम करके। तीन गाड़ियां मेरे सामने से चली
- 49:42गईं और मुझे दिखी नहीं। इतनी बड़ी गाड़ी कई घंटे बीत गए
- 49:49हैं। मैंने कुली से पूछा, भईया ऋषिकेश
- 49:55को गाड़ी कब आएगी? आपने कहाँ जाना?
- 49:59बहुत देर के बैठी मैं देख रहा हूँ वहाँ पर कुली का काम करता था बाढ़
- 50:04धुने का मैंने कहा मैंने ऋषि के समय गाड़ी नहीं आ रही गाड़ी दो जब
- 50:14से मैं बैठा देखता हूँ तुम्हें। गाड़ी अब तो तीन चली गई तुम्हें
- 50:21दिखी नहीं, मैंने कहा गाड़ी कोई आई नहीं, मेरी नजर बड़ी तेज है,
- 50:27मैं एक किलोमीटर से देख लेता हूँ गध जैसी नजर है मेरी बड़ी जवानी।
- 50:36अच्छी खुराक और अच्छा व्यायाम सात किलोमीटर की दौड़, तीन चार किलो
- 50:50दूध रोज़गार तैसी घी खाने की कोई कमी नहीं वरीष्ठ शरीर।
- 51:00और आँखें इतनी से दूर से देख लेती हूँ।
- 51:08आज तो करीब से भी नहीं दिखता। तीन गाड़ियां चले गई तुम्हें दिखी
- 51:17नहीं? मैंने कहा नहीं गाड़ियां चल गई ही
- 51:20नहीं, मैं यहीं तो बैठा हूँ। इतने में गाड़ी उबर आ रही थी।
- 51:27कहता वो सामने से गाड़ी आ रही है, उस पे बैठ जाओ, तुम चले जाओगे,
- 51:36पता नहीं कौन था मैंने जीवन में ऐसे बड़े जुबे तक हैं।
- 51:44मेरे धर्मपत्नी के 110 बुखार बच्चे छोटे दो मैंने जाना है
- 51:53रामलीला में आखिरी दिन है राज्याभिषेक हो ना 110 उकार।
- 52:05एक टेम्पू वाला बिल्कुल नया टेम्पू आके खड़ा हो गया।
- 52:10रुका शर्मा जी आपने मुझे बुलाया, बुलाया तो नहीं था मुझे मैंने
- 52:21कहा। मैंने सोचा मन में लेकिन फिर उसके
- 52:25लिए लाओ, मैंने बच्चों से कहा कि जल्दी करो टेम्पो में बैठाओ लेटाओ
- 52:37ले जाओ मैं समझ गया किस के लिए लाएगा?
- 52:43नहर में गिर गया रस्सी नहीं है तैरना कोई जानता नहीं और आज लोग
- 52:50श्रेय लेने को फिर रहे जस्ट रस्सी के बिना मुझे निकाल नहीं सकते थे
- 52:58रस्सी बाबा कहते मैंने भेजा। और वो कहते हैं, श्रेय हमें मिलना
- 53:04चाहिए। अगर ना गिरता तो क्या होता?
- 53:11श्रेय किस से मिलता? तुम पुण्य को भी श्रेय लेने का
- 53:17आधार बना लेते हो। इसलिए दुनिया आज इतनी दुखी है फिर
- 53:26तुम परमात्मा को ढूंढ़ते हो। तुम ना जाने किस यहाँ?
- 53:37मैं खो गए तुम न जाने किस जहाँ मैं खो गए।
- 53:53हम भरी दुनिया में तनह हो गए तुम न जाने किस जहाँ।
- 54:12मैं खो गए, हाँ भरी दुनिया में तनह हो गए, तुम न जाने।
- 54:30किस जहाँ में खो? किस जहाँ में खो गए हमें बनाकर हम
- 54:42भरी दुनिया में तन्हा हो गए कहीं नहीं गया वो।
- 54:47उपनिश्चित चल्ला चल्ला के कहते हैं ईशावास मिदं सरबं यत किंच जगत
- 54:53या आम जगत जरे जरे में वह है, उसका वजूद है, वही ही है, दूसरा
- 55:02कोई नहीं एको ब्रह्मादृतीय नाष्ट्य है।
- 55:07और तुम कहते हो तुम कहाँ खो गए कहीं नहीं खोया वो तुम ही खोए
- 55:14फिरते हो तुम शास्त्रों में खो गए तुम वेद व्यास के लिखे शास्त्रों
- 55:20में खो गए। एक किशोर तुम्हारा है, परमात्मा
- 55:29का नहीं परमात्मा तो सब स्थानों में है सब जगह बस तुम्हें ढूंढने
- 55:38की सरीका नहीं आया। वह कहीं जाता नहीं वह कहीं गया
- 55:47नहीं, उसी ठोर पे है वो दादू कहते हैं, दादू दूजा को नहीं, कोई
- 56:01दूसरा नहीं है ए कोंकार सत्य नाम दादू दूजा को नहीं।
- 56:07दो जी मन की दौड़ तुम्हारा मन दौड़ाता है।
- 56:10तुम्हें यह कल्पना के कारण तुम पटक रहे हो अन्यथा वो तो कभी कहीं
- 56:20ज्ञान है जिसकी तलाश में तुम फिर रहे हो तीर्थों में?
- 56:27हाज में मक्का मदीना, दादू, दूजा को नहीं दूजे मन की दौड़ तुम्हारा
- 56:37मन दौड़े तो कृपया क्या करें दादू कहते हैं अगर तुम।
- 56:47उस आनंद में प्रतिष्ठित होना चाहते हो जैसे कृष्ण ने कहा क्षति
- 56:51प्रज्ञा उजा अर्जुन हो तो क्या करो, दौड़ गई संशय बेटा ये मन का
- 57:00दौड़ धो बंद कर दो, कहीं मत जाओ। हिल स्टेशन देखने के लिए कब जाओ,
- 57:09बिलकुल ठीक उसका नजारा देखो चखो। झूम बराबर झूम सब।
- 57:18पियो और झूमो ये बात अलग है, लेकिन परमात्मा नहीं है वहाँ।
- 57:25परमात्मा कहीं नहीं मिलेगा। तुम्हें अपने भीतर के सिवा कहीं
- 57:33नहीं हो। एक ही रास्ता है आज चुन लो।
- 57:401000 जन्मो के बाद चुन लेना, लाख जन्मो के बाद चुन लेना, रास्ता एक
- 57:48दौड़ मिटी, सुन सह गया, जैसी ही तुम्हारी दौड़ मिट गयी, मन ठहर
- 57:54गया, मन के ठहरते ही तुम पाओगे, जैसे ही ढूंढ रहे तुम।
- 58:01वो मिल गया जिसकी तलाश जन्मो जन्मो से थी, वह मिल गया तो फिर
- 58:10इतने जन्मो तक क्यों भटका? तुम्हारा मन भटका, तुम कहाँ भटका?
- 58:17बस तू ठोर की ठोर। तुम तो वहीं हो आध सच जुगाद सच है
- 58:24भी सच नान कोसी भी सच अर्थ किशोर कर लेते हो तुम वो कहीं गया नहीं
- 58:33कहीं जाएगा नहीं यहीं है यहीं पे है।
- 58:39यही रहेगा सदा तुम चले जाते हो तुम भटक जाते हो वह नहीं भटकता
- 58:55वस्तु ठोर की ठोर? वह वहीं रहता है।
- 59:02बस तुम भागते हो कल्पना में तुम कहते हो गद्दियाँ ले लें मैं
- 59:10पहुँच जाऊंगा वहाँ जिसकी तलाश है धन के अंबार लगा ले सारी दुनिया।
- 59:20पांव पूजने लग जाए आरती उतारने लग जाए मेरे मंत्र बन जाए जीते जी बन
- 59:24जाएंगे, बना लो लेकिन आज सुन लो फिर सुन लो, संत सदा से कहते रहे
- 59:34और कहते रहेंगे। ना रब मक्के ना रब, तीरथ कहीं
- 59:53नहीं उल्टा है, मिलेंगे तो तुम्हारे भीतर से मिलेंगे और
- 1:00:00तुम्हारे भीतर से ही तुम उसे छोड़ के आया।
- 1:00:05जहाँ छोड़ के आए हो वहीं पे मिल जाएगा वो तो ज़रा भी नहीं हिलता
- 1:00:10है, निर्लिप्त है अकम्प है, उसकी लोह हिलता ही नहीं, वहीं जमा बैठा
- 1:00:18है क्योंकि। सभी जगह समाया हुआ है।
- 1:00:28ज़रा सोचो जो चीज़ सभी जगह समाई हुई है, वे कहाँ हिलेगी और हिलेगी
- 1:00:35तो जाएगी कहाँ जब है ही वो? कहाँ जाएगी और कहाँ से हिलेगी
- 1:00:45कहीं नहीं जा सकती। कहीं से नहीं हिल सकती वस्तु ठोर
- 1:00:49किठोर वस्तु वहीं पे रहती है जिसे तुम ढूंढ रहे हो वो कभी चली नहीं,
- 1:00:57कभी चलेगी नहीं। वो सच है, वो ठहरा हुआ है बस तुम
- 1:01:03दौड़ रहे हो तुम्हारा ठहरना बाकी है, वह तो ठहरा हुआ है, जीसको
- 1:01:14पाना है मंजिल सदा वहीं है। यात्री ही भटक जाती है।
- 1:01:26जिसे छोड़ के जहाँ आए थे उसे वहीं पौक है।
- 1:01:40बड़े शोक से सुन रहा था ज़माना, बड़े शोक से सुन रहा था ज़माना।
- 1:01:51हमीं सो गए दास्तां कहते कहते हैं बड़े शोक से सुन रहा था ज़माना
- 1:02:02हमीं सो गए दास्तां कहते कहते हैं।
- 1:02:07तुम ही सो जाते हो दास्तां कहते कहते जमानत तो बड़े शोक से सुनता
- 1:02:14है, वह तो तुम्हारा इंतजार कर रहा है अघोष।
- 1:02:27अपनी बाहें फलाएं तुम्हें अक्रोश मिले नको तत्पर हर कड़ी तुम्हारी
- 1:02:35ही इंतजार है तुम कब जाओगे कोई कहीं नहीं जाता आता।
- 1:02:46बस तुम्हारी कल्पनाएं ही आती जाती हैं।
- 1:02:50उन्होंने ही इतना परिश्रम किया है और ये सब दुख तुम्हारे परिश्रम का
- 1:02:55फल है तुम्हें हैरानी होगी जानकर सब दुख तुम्हारे क्रिएटेड हैं।
- 1:03:04सेल्फ क्रिएटेड किसी ने नहीं अपनाई, कोई तुम्हें दुख नहीं देता
- 1:03:14मानव निर्मित हैं दुख तुम सो जाते हो दास्तां कहते कहते हैं।
- 1:03:27वह तो सदा से मौजूद है, वह तो कभी सो सकता भी नहीं, उसका स्वभाव
- 1:03:32नहीं है सोना वह तो जागता ही रहता है वह सोता नहीं कभी इसलिए भगवान
- 1:03:43कृष्ण ने कहा तुम्हारा संसार जब सो जाता है रात को।
- 1:03:48मेरा योगी रात को जागता रहता है, बस यही इशारा था, तुम समझ नहीं
- 1:03:54पाए, तुम शब्दों के अर्थ करने में जुट गए और तुमने भटका दिया शब्दों
- 1:03:59के अर्थ करने वालों ने दुनिया को भटका दिया है अपने से दूर।
- 1:04:05बहुत दूर निकल गई दुनिया यहाँ। से हो के मजबूर चला मैं बहुत दूर।
- 1:04:29बहुत दूर, बहुत दूर चला तेरी दुनिया से।
- 1:04:45हो के मजबूर चला मैं बहुत दूर, बहुत दूर।
- 1:05:01बहुत दूर चला दूर। निकलते निकलते इतनी दूर आ गया,
- 1:05:14आँखें बंद हैं, सपना देख रहा है कल्पना में खोए हो।
- 1:05:23और गुरु तुम्हें झंझोरता है आँखें खोलो, तुम ही हो तो तू हमारी
- 1:05:32श्वेत कह दो, तुम ही हो आँखें खोलो सो क्यों गया?
- 1:05:43हमीं सो गए दास्तां कहते कहते श्रीकृष्ण।
- 1:05:52गोविंद हरे मुरारी। हे नाथ नारायण वासुदेव, श्री
- 1:06:08कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ नारायण?
- 1:06:18वासुदेव श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव
- 1:06:34पितु मात स्वामी। सखा हमारे पितुमात स्वामी सखा
- 1:06:44हमारे हे नाथ नारायण वासुदेव श्री कृष्ण गोविंद।
- 1:06:57हरे मुरारी हे नाथ नारायण, वासुदेव, श्रीकृष्ण, गोविंद हरे
- 1:07:09मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव। धन्यवाद।