Latest / Baba ji Vijay Vats / 16/2/26 - मन के पेंडुलम को कैसे रोकें? इच्छाओं का मनोविज्ञान: जीने और मरने की चाहत!!
Transcript
- 0:13बाबा जी प्रणम आज मेरा जन्मदिन है और मेरी इच्छा है कि मेरा जन्मदिन
- 0:29ही मेरा मरमदिन बन जाए। मोनिका मरने की तमन्ना भी एक
- 0:51तमन्ना है, यह भी एक बार है। और इच्छाएं की तरह यह भी एक इच्छा
- 1:07है और इच्छाएं हमारे मन के ऊपर बोझ हैं जब सभी इच्छाएं मर जाएं।
- 1:22तो व्यक्ति निरपोष हो जाता है। इससे पहले तुम में जीने की तमन्ना
- 1:31थी आज तुम में मरने की तमन्ना? कोई तरक्की नहीं हुई, तमन्नाएँ
- 1:49शेष रह गई, सिर्फ तुमने वस्त्र बदल लिया, भीतर का शरीर वही रहा।
- 2:02वस्त्र बदली आशा तृष्णा ने मरी कह गए भक्त कबीर, माया मरी न मन मरा।
- 2:20मर मर गए शरीर यह भी मन का ही एक हिस्सा है कभी मन कहता है कि मैं
- 2:34जीना चाहता हूँ कभी मन कहता है कि मैं मरना चाहता हूँ।
- 2:43तो एक बात को समझना चाहत भी शेष है और जब तक चाहत शेष है पुत्रे
- 2:59तो तब तक बोझ है। बोझ सिर्फ वासनाओं का नहीं होता
- 3:14बोझ, परमात्मा का भी होता है बोझ सिर्फ वासनाओं का नहीं होता काम
- 3:29वासनाओं का बोझ नहीं होता। बोझ ब्रह्मचर्य का भी होता है।
- 3:37बोझ किसी को घृणा के शब्द बोल देने से नहीं आता, मात्र बोझ
- 3:46प्रेम से ही बोलूं, यह भी एक बंधन है।
- 3:53जीवन की नदी जब सहज प्रभाव से बहती है तब आता है जीवन का असली
- 4:03आनंद। जीवन की सरिता अगर बहने की सहजता
- 4:16को खो दे तो जीवन का लुत्फ समाप्त हो जाता है।
- 4:25ललित समाप्त हो जाती है। जीवन की लज्जत उठाना चाहते हो तो
- 4:41फिर दैत्य भी बोझ है और देवता भी बोझ है।
- 4:51अक्सर मनुष्य गलती नहीं कहा जाता है।
- 4:59वो कहते हैं, ये तो मैंने गाली तो नहीं निकाली, मैंने तो भगवान का
- 5:03नाम लिया है, गाली भी शब्द है, भगवान का नाम भी शब्द है और दोनों
- 5:13ही बोझ। सिर के ऊपर बोझ ईंटों का हो, मलबे
- 5:20का हो या हीरों का हो होता तो बोझ सिर के ऊपर मुकुट खांसी का लगा लो
- 5:37या स्वर्ण हीरे लड़े। बहुत बराबर है।
- 5:43दोनों में वो शाक कदर की पहलू यह सोने की पोशाक की पहलू बहुत सामान
- 5:58है दोनों। इससे पहले तुमने जीने की इच्छा
- 6:06थी, आज तुमने मरने की इच्छा कर ली, लेकिन पुत्री इच्छाओं का बोझ
- 6:18कहाँ गया? इच्छा ने वस्त्र परिवर्तन कर
- 6:26लिया, इच्छाएं वैसी ही बनी रही, महज श्वेत वस्त्र छोड़कर भगवा रंग
- 6:39धारण कर लिया। भगवा छोड़कर सुए से धारण कर लिया।
- 6:49भीतर से क्या बदला? कुछ भी नहीं बदला पुत्री अपने
- 6:58प्रश्न को ठीक से समझो। आज मेरा जन्मदिन है और मैं चाहती
- 7:07हूँ कि आज मेरा मर्मदिन भी हो जाए।
- 7:12चाहत तो बनी रही ना इच्छाएं बहुत हैं तो रो लायी।
- 7:22इच्छाएं बहुत हैं तो रुलाई हैं, इच्छाएं कम हैं, शहनशाही हैं
- 7:29इच्छाएं बिल्कुल नहीं थो खुदाई आशा त्रिशीना ना मरी मर मर गए सर।
- 7:42माया मरी न मन मरा, मन कह ध्यान रखो आप किसी भी चीज़ को मार नहीं
- 8:03सकते। यू कांट डिस्ट्रक्ट नीदर मैटर नोर
- 8:12कान्शस्नस न तुम पदार्थ को मार सकते हो न तुम चेतना को मार सकते
- 8:25हो। फिर तुम मारोगे किस तुम मार किसी
- 8:31भी नहीं सकते मरता यहाँ कुछ नहीं, कोई भी नहीं फिर मैं क्या कह रहा
- 8:39हूँ तुम्हारे सिर के ऊपर बट्ठल है।
- 8:45और उस भट्ठल में बाहर है वो भार में गोबर है या हीरे हैं, लेकिन
- 8:55भार है मैं तुम्हें कहता हूँ, इस भट्ठल को ही पटक दो, तुम भार
- 9:04मुक्त हो जाओ। जीने की इच्छा हीरों का भार है।
- 9:11मरने की इच्छा गोबर का भार है, लेकिन दोनों ही भार मैं तुम्हें
- 9:21दोनों को ही भार से मुक्त करना चाहता हूँ।
- 9:24पर वो ही सही मुक्ति मैं तुम्हें भार मुक्त करना चाहता हूँ लेकिन
- 9:35तुम कहते हो ये तो ये तो हीरे हैं।
- 9:43मैं गोबर को फेंक देता हूँ, हीरे को रख लेता हूँ नहीं मैं तो मैं
- 9:49कहता हूँ हीरों को पहले फेंको, क्योंकि इनसे मन से पटने का
- 9:55करेगा। हीरों को पहले फेंक दो, क्योंकि
- 10:00हीरों को फेंकना मुश्किल भी होता है।
- 10:04तुम अपने घर का सोना नहीं फेंक सकते हो।
- 10:10रोज़ बहारी झाड़ू करके कचरे को फेंक सकते हो, लॉकर का सोना नहीं
- 10:19फेंक सकते हो लॉकर के हीरे द्वारा?
- 10:22तुम फेंक नहीं सकते क्योंकि वो तुम्हारे लिए बहुत मूल्य है, तुम
- 10:32काम वासना को छोड़ सकते हो, लेकिन तुम आनंद की।
- 10:40इच्छा से मुक्त नहीं हो सकता। अब इसको ध्यान से समझे ना अगर काम
- 10:49वासना की इच्छा आपने छोड़ दी। अभी तक काम में आनंद आता था तो
- 10:58काम वासना की इच्छा को छोड़कर। अगर तुमने परमात्मा के आनंद की
- 11:04इच्छा रखी तो बेकार है। इच्छा तो चाहे आनंद की हो, चाहे
- 11:18वासना की हो। इच्छाएं तो दोनों ही बराबर हैं।
- 11:22दोनों में बाहर हैं। मेरी बात समझो बेटी मैं कहता हूँ
- 11:31इच्छा विहीन हो जाओ, फेंक दो सब कुछ और देखो भी ना कि मैंने फेंका
- 11:39क्या है? क्योंकि अगर तुम देख लोगे तो
- 11:45तुम्हारा मन फिर उससे करेगा नहीं, नहीं नहीं ये तो नहीं फेंक रहा था
- 11:49हमने ये तो हीरे हैं ये तो काम आएँगे।
- 12:01मैंने अक्सर सुने है लोग। धन को थोड़ा थोड़ा जोड़ लेना
- 12:09चाहिए। मैं पूछता हूँ काहे?
- 12:16जरूरत के वक्त काम आएगा। मैंने कहा ये पक्का पता है कि
- 12:24जरूरत तो होगी कभी ये तो पता फिर अगर जरूरत न पड़ी तो तो फिर पड़ा
- 12:35रहेगा, लेकिन। इसका पड़ा रहना भी तुम्हारे दिमाग
- 12:41में बोझ है। तुम चौकीदारी करो और चौकीदार
- 12:47तुम्हारी रात की नींदों को छीन लेगा।
- 12:54अब आगे जो भी हो, अंजाम देखा जाएगा।
- 13:01अब आगे जो भी हो, अंजाम देखा जाएगा।
- 13:06खुदा तलाश लिया और बंदकी कर ले बस तुम्हारा काम इतना ही होना चाहिए,
- 13:12तुम बंदकी कर लो और बस खत्म कर लो।
- 13:21जीवन की इच्छा और मृत्यु की इच्छा दोनों ही इच्छा है और दोनों में
- 13:33भार है। सिर के ऊपर चाहे विषय की पोटली हो
- 13:42के अमृत की पोटली हो, ध्यान रखना दोनों में बोझ होता है, आई तू
- 13:51मरना चाहता है। कल तुम जीने के लिए अमृत मांगोगे
- 14:02यह मन की ही चालबाजियां मन तो न मरा, मांग तो न मरे पहले मांग थी
- 14:15सुख की। अब मांग है दुखों की पहले मांग थी
- 14:22कि मैं कैसे जी लूँ और जीने के साथ में जुटा लूँ और महल अटालियां
- 14:28तुमने खड़ी कर बैंक बैलेंस से बढ़ा दिया सब इकट्ठा कर दिया।
- 14:38लेकिन ज़रा भीतर झांक के देखना सब इकट्ठा करने के बावजूद भी
- 14:44तुम्हारे भीतर तृप्ति आई, सैटिस्फैक्शन आई।
- 14:53मन तृप्त हुआ। अगर नहीं हुआ तो अभी चबका हट बाकी
- 15:03है। एक बात सुन लें।
- 15:11इच्छा इच्छा ही होती है और इच्छा बाहर होती है वो जीने की हो या
- 15:17मरण की हो जब व्यक्ति इच्छा से विहीन हो जाता है।
- 15:30उस अवस्था में हमने जाना है हम सपायो मानसरोवर हम सपायो।
- 15:56मानसरोवर ताल तलैया क्यों डोल ताल तलैया क्यों डोल?
- 16:14मन मस्त हुआ मन मस्त हुआ मन मस्त हुआ फिर क्यों बोल मन मस्त हुआ
- 16:29फिर क्यों बोल? जब तुम सभी करा दोगे सर के ऊपर
- 16:36भार हो, चाहे कंकड़ पत्थर थे या हीरे मोती थे फिर मन मस्त हो
- 16:42जायेगा फिर कोई चौकीदारी की जरूरत नहीं बचाओगे किसको और रखवारी
- 16:49करोगे किसको? रखवादी करने को कुछ बचे वही
- 16:58अवस्था निर्माण की अवस्था है, वही अवस्था कैवल्य की अवस्था है।
- 17:05वही अवस्था है जहाँ तुम्हारी सभी समस्याओं का समाधान हो जाता है।
- 17:11उसे ही समाधि कहते हैं। समाधान हो जाना फिर कोई समस्या
- 17:17बाकी रहती है और तुमने उस अवस्था तक पहुंचना है।
- 17:32जीवन को बड़े आनंद से जीना भी एक इच्छा है और जीवन को खत्म कर देना
- 17:40भी एक इच्छा है। इसको हीरा मत समझ लेना।
- 17:46यह भी भार है। और तुमने बाहर से मुक्त होना है
- 17:50तुमने निर्भार होना है। यह भी एक चिंता है कि मैंने कुछ
- 17:58कमाना है। यह भी एक चिंता है कि मैंने कुछ
- 18:02दान देना है और तुमने निश्चिंत होना है।
- 18:11ना कुछ अर्न करना है, ना कुछ थ्रो करना है।
- 18:15फेंकना भी कुछ नहीं और कमाना भी कुछ नहीं।
- 18:22नो कंस्ट्रक्शन, नो डिस्ट्रक्शन। कुछ जोड़ना नहीं, कुछ बनाना नहीं,
- 18:32कुछ तोड़ना नहीं, कुछ गंवाना नहीं।
- 18:38मन का यही स्वभाव है मन, पेंडुलम की तरह।
- 18:44एक छोर से दूसरे छोर तक आता जाता रहता है और ध्यान से समझना मेरी
- 18:52बात को मन जब एक छोर से दूसरे छोर तक जाता है तो सदा ही मध्य में से
- 19:00गुजर के जाता है। वह मध्य जहाँ तुमने ठहरना है, तुम
- 19:09रोज़ मध्य में से निकल के जाते हो, तो तुम्हें उस मध्य के क्षण
- 19:15में थोड़ा सा आनंद पल भर के लिए आता है।
- 19:20लेकिन तुम्हें पता नहीं होता यह आनंद तुम्हें क्यों आया यह वो
- 19:29क्षण था जब तुम मध्य में पल भर के लिए रुके तब आनंद आया काश तुम उस
- 19:38मध्य बिंदु को। खोज लेते जब इधर से उधर और उधर से
- 19:45इधर जाते वक्त तुम अचानक एक लम्हे के लिए कहीं ठहर गए थे।
- 19:53वो मध्य बिंदु था जहाँ लम्हे में तुम ठहर गए एक अक्षण।
- 19:59महत्त्व में बड़ा आनंद आएगा, क्योंकि वह वर्तमान है, ना भविष्य
- 20:04है, ना अतीत है। पेंडुलम तो भविष्य में भी जाता है
- 20:09और पेंडुलम तो अतीत में भी जाता है लेकिन मध्य में से सदा ही हो
- 20:14के जाता है। अतीत में जाना तो भी मध्य में से
- 20:20गुजर के जाएगा और भविष्य में जाना तो भी मध्य में से गुजर के जाएगा
- 20:26और उस मध्य में से गुज़रने के वेला में तुम्हें शांति का आनंद
- 20:31महसूस होता है। वो तुम्हें बड़ा प्यारा लगता है
- 20:34लेकिन तुम उस क्षण को पकड़ नहीं पाता।
- 20:38यह तुम्हारा दुर्भाग्य है, बस उस एक पल की खोज में तुम सारी
- 20:51ज़िन्दगी या जनगानियां नष्ट कर देते हो वो पल नहीं तुमसे पकड़ा
- 20:56जाता है। अल भर के लिए पल भर के लिए मेहमान
- 21:15यहाँ। मालूम नहीं मंजिल कहाँ पल भर के
- 21:31लिए। मेहमान यहाँ मालूम नहीं मंजिल है
- 21:46कहाँ पल भर के लिए वो पल भर जो तुम्हे।
- 21:56आनंद से सराबोर कर गया। वह पल का सही सही स्थान तुम ढूंढ
- 22:05नहीं पाए? वह मध्य बिंदु कहलाता है और सारी
- 22:12साधना। शारी ग्रंथ गीता, कुरान, पुराण,
- 22:19बाइबल, वेद, उपनिषद, अवशितों कोई भी संत हो, बुध हुए, महावीर हुए।
- 22:34जड़ सवस्थ हुए प्रत्येक ने तुम्हें सिखाया हौ टु टॉक इन
- 22:45प्रेज़ेंट वर्तमान के उस क्षण में कैसे ठहरना?
- 22:56सारे वेदों में सारे प्राणों में सारे धर्मग्रंथ हूँ, एक ही बात है
- 23:07और सारे संत तुम्हे एक ही बात सखाते हैं सभ्य स्याने एक मत
- 23:13मूर्ख अपनों अपने। वृक्ष तुम्हें दुड़ाते हैं, राम
- 23:17राम करते रहो राधे राधे करते रहो। यह है दौड़ना कोई नाम, कोई
- 23:29शास्त्र पढ़ना, कोई मंत्र जप करना या दौड़ना।
- 23:34जैसे जैसे माला घूमती है तुम्हारा मन भी दौड़ता है।
- 23:40तुम एक यात्रा में निकले हो, अगर आज तल्क तुम इस धरती पर विद्यमान
- 23:47हो तो उसका महज कारण है कि तुम ठहरे नहीं कभी।
- 23:52सभी शास्त्रों का रस तुम उस एक मध्य बिंदु को तलाश करके उस मध्य
- 23:59बिंदु में ठहर जाओ और तुम्हारी खोज पूरी हो गई, फिर तुम ताल
- 24:09तलैया में दौड़ोगे। फिर तुम पदार्थों को इकट्ठा करने
- 24:15में भागोगे नहीं, फिर तुम्हें अशांति तंग नहीं करोगे, फिर तुम
- 24:25जीवन के उन परम आनंद ठहराव के क्षणों में ठहर ही जाओगे।
- 24:30सलाह के लिए फिर तुम कहो कि बाबा ये मंत्र दौड़ता रहेगा कभी पदार्थ
- 24:41को जुटाने में, कभी परमात्मा को जुटाने में, परमात्मा भी तुम्हारी
- 24:49तिजोरी में। बंद हो जाता है और पदार्थ भी
- 24:55तुम्हारी तिजोरी में लॉक कर्ज में बंद हो जाता है।
- 25:03फिर लोग पूछते हैं बाबा क्या करें?
- 25:07यह मन तो दौड़ता ही रहेगा कवि पदार्थ के लिए कवि परमात्मा के
- 25:13लिए। फिर हमें चैन कब मिलेगा?
- 25:15वो तो मरने के बाद मिलेगा, इसलिए तो मरना मांगते हैं नहीं अब तो
- 25:20घबरा के ये कहते हो हो के मर जाएंगे अब तो घबरा के ये कहते हो
- 25:27के मर जाएंगे घर मर के ही चैन न पाया तो किधर जाएंगे?
- 25:42फिर क्या करे बाबा? फिर ये चेन कैसे मिले, ये ठहराव
- 25:47कैसे मिले? यह मन तो पेंडुलम की तरह अतियों
- 25:52पर जाकर एक अति तक गया। वहाँ पर ठहरा कुछ देर के लिए फिर
- 26:00वापस आया, फिर दूसरे अति पर गए वहाँ पर ठहरा फिर वापस आया, लेकिन
- 26:09तुम भूल जाते हो कि जब भी पेंडुलम गुज़रना है।
- 26:20इस ओर से उस ओर और उस ओर से इस ओर श्रद्धा ही मध्य में से उखड़ जाता
- 26:26है। श्रद्धा बस वह मध्य बिंदु तुमने
- 26:32खोजना है, वहाँ है चैन वहाँ है करार और वह तुम्हारी सुध को विसरा
- 26:39लेता है। वो तुम्हें मदहोश कर देता है।
- 26:47वो काला है इक बां सुर वाला। मोरी रे सुद विसरा गयो मोरी।
- 27:34माखन चोर हो नन्द किशोर जो कर गयो मन की चोरी रे।
- 27:53सूजे वे से रहा गयो मौ रे ओह काला इक बांसुरी वाला पेण्डुलम के दो
- 28:12छोर। लेकिन राहत मिलती है मध्य बिंदु
- 28:17में और मध्य बिंदु की ये पहचान है कि तुम बड़े आनंद से अपरसीमित
- 28:29खुशी के खुमार से तुम लहर आउट हो गए।
- 28:32तुम्हारे जीवन की बगिया खिल जाएगी, तुम्हारे जीवन की बगिया के
- 28:38फूलों में सुगन्ध छाया जाएगी, लेकिन समस्या है कि तुम मध्य
- 28:47बिन्दुओं को खोज नहीं सकते। क्या करें बाबा यह जो मन का
- 28:58पेंडुलम इधर से उधर तक अतियों में जाता है इसके पीछे तुम्हारा ही
- 29:06ताक लगा है। अगर इसको छोड़ दो अपनी हाल पर तो
- 29:18पेंडुलम इधर से ही उधर जाएगा। थोड़ी देर के लिए इधर से उधर
- 29:23जाएगा जैसे साइकिल चलाते चलाते तुम बैटल मारना बंद कर दो।
- 29:31एक वक्त आएगा जब साइकिल ततिक्षण नहीं रुकेगी।
- 29:39धीरे धीरे कम होती जाएगी रफ्तार लेकिन तुम पैडल ना मारो और लगा
- 29:49हुआ बल्ब जो आपने लगा दिया साइकिल को चलाने में, वह धीरे धीरे।
- 29:59साइकिल को चलाएगा और जब सारा बल समाप्त हो जाएगा तो साइकिल धडक से
- 30:05घिरेगा तो मन के पेंडुलम को तुम ही शक्ति देते हो।
- 30:12इधर से उधर जाने की और शक्ति क्या है बात सुनाएँ?
- 30:22तो वासना सिर्फ बुरी वासना वासना नहीं होती सिर्फ काम, क्रोध, लोक
- 30:31मोह हुंकार, भैर मद, मत्सर ही वासना नहीं होती।
- 30:38वर्ण, परमात्मा, खुशी, आनंद, सुख, देवी, देवता, धन इकट्ठा करना सब
- 30:49सुख शांत रहे। हमारे घर में यह भी एक इच्छा है
- 30:54ये भी एक उपासना। इच्छाएं मातृभाषा नहीं, इच्छाएं
- 31:00मातृभाषा नहीं वो इच्छाएं चाहे संसार की हो, चाहे परमात्मा हो,
- 31:06कोई फर्क नहीं पड़ता। मोमेंटम तो मोमेंटम है, वेलोसिटी
- 31:17तो वेलोसिटी है, इस दिशा में घूमो, उस दिशा में घूमो।
- 31:21पेंडुलम दोनों दिशाओं में घूमता कोई अच्छी नहीं होती दिशा पेंडुलम
- 31:28के लिए कोई बुरी नहीं होती दिशा पेंडुलम के लिए।
- 31:33इधर भी वासना है, दौड़ है, उधर भी वासना है, दौड़ है लेकिन एक रेस्ट
- 31:40पॉइंट ऑफ़ रेस्ट है, वो है मत बिंदु और वो सदा ही आता है, बस
- 31:49सिर्फ तुमने जीवन में अगर कोई गलती की।
- 31:56तो गलती यही थी कि तुम उस मध्य बिंदु में से गुजरे तो सदा है और
- 32:03यह मध्य बिंदु में एक क्षण से गुजर जाना ही तुम्हें जीवन जीने
- 32:08की इच्छा दी जाता है। तुम्हें पता भी नहीं चलता कि हम
- 32:16कौन सा क्षण था जब मध्य बिंदु में से गुजर गए, उस मध्य बिंदु में
- 32:23बड़ा आनंद है, उस मध्य बिंदु में अगर तुम सदा के लिए ठहर जाओ।
- 32:31तो फिर तुम्हें और कुछ मांगने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
- 32:35वह इतना रसीला है, वह अमृत का समुद्र है।
- 32:41जीसको पीने से सभी तमन्नाए वासनय मिट जाती है और वासनय सिर्फ संसार
- 32:48की नहीं होती। बस नहीं, परमात्मा के भी होते हैं
- 32:52तो त्याग दो, ना संसार के पदार्थ इकट्ठे करो, ना परमात्मा का नाम
- 33:01इकट्ठा करो, फेंक दो, माला को तोड़ दो।
- 33:07भलो भयो, हरी भी सरो सर से टली भला जैसे ही तुम माला को तोड़
- 33:12दोगे और फेंक दोगे तो हमारे सर से बाहर उतर जाएगा।
- 33:20फिर कबीर कहते हैं जैसे ही मैंने माला को तोड़ के फेंक दिया।
- 33:26भलो भयो हरि भी सरो बहुत अच्छा हो गया, परमात्मा के नाम को भी सर
- 33:31गया सर से टली बला ये बाद में पता चला कि यह तो एक बला थी, यह बला
- 33:43ही तुम्हें उलझाए रखती है। तुम यह समझो कि सिर्फ वासनाएँ
- 33:48संसारिक वासनाएँ हमें उलझाती हैं, नहीं तुम गलती में हो।
- 33:52तुम्हें पारमार्थिक वासनाएँ भी उलझती है।
- 33:56उलझन तो उलझन है और उलझन दुख पैदा करती है, उलझन दौड़ पैदा करती है।
- 34:05और दौड़ तुम्हारा सब चैन छीन लेती है मन का स्वभाव नहीं है, दौड़ना
- 34:17तुम गलती में साइकिल का स्वभाव कहाँ है दौड़ना?
- 34:27साइकिल का स्वाभाव तुम जैसे बना दोगे वैसा हो जाएगा तुम पैटल
- 34:32मारोगे तो वो चलेगी, तुम पैटल मारना छोड़ दोगे तो वो रुक जाएगी,
- 34:38लेकिन रुकने में थोड़ा सा वक्त लेगी।
- 34:42बस तुम यहीं घबरा जाते हो। जब तुम पेटल मारना छोड़ देते हो,
- 34:48तो तुम कहते हो भाई ये रुकी क्यों नहीं रुकेगी?
- 34:53थोड़ा देर से रखो, बस तुम कृपा करो, पेटल मत मारो रुकेगी निश्चित
- 35:01रुकेगी सभी की साइकिलें रूकती हैं।
- 35:05तुम ज़रा पेडल मारना छोड़ के देखो रफ्तार धीमी धीमी धीमी होती जाएगी
- 35:19और धीमी होती होती लुढ़क जाएगी एक दम।
- 35:24ये साइकिल का स्वभाव नहीं है। दौड़ना तुम इससे काम लेते हो और
- 35:31जब इससे काम ले लेते हो फिर इसको स्टैंड लगाके खड़ी कर देते हो।
- 35:35एक तरफ तुम्हारा कोई भी यन्त्र उसका स्वभाव नहीं है, दौड़ना तुम
- 35:41दौड़ाते हो? वो गाडी हो, वो स्कूटर हो, वो
- 35:45साइकिल हो, वो जहाज हो, वो कसती हो, स्वभाव किसी भी चीज़ का
- 35:54दौड़ना नहीं, उसको तुम दौड़ाते हो?
- 35:58इसी तरह मन का भी स्वभाव नहीं है, दौड़ना तुम दौड़ाते हो?
- 36:02तुम्हारी इच्छा दौड़ाती है और इच्छाएं ही दौड़ने का प्रमुख कारण
- 36:07है। इच्छा चाहे अच्छी है, चाहे बुरी
- 36:14है, इच्छा तुम्हें दौड़ाती है तुमने।
- 36:21हीरे कमाने हैं या तुमने कंकड़ पत्थर कमाने हैं बस ये कमाने की
- 36:30दौड़ भाग यही इच्छा तुम्हारा चयन खेल लेते है।
- 36:38दौड़ना बंद कैसे करें बाबा? मन का दौड़ना बंद कैसे करें?
- 36:47सुबह उठो, हल्का चाय, पानी करो, नाश्ता करो, आराम से बर जाओ।
- 36:59पूजा स्थल में बैठ जाओ या घर के किसी कोने में या धरती पे बैठ
- 37:07जाओ, कोई आसन लगा के या दीवार के साथ पिट लगा के बैठ जाओ या लेट
- 37:16जाओ। आसन महत्वपूर्ण नहीं, महत्वपूर्ण
- 37:20है मन का ठहरना साइकिल लेडीज है, जेंट्स है उसके घंटी लगी नहीं
- 37:29लगी, करियर लगा नहीं लगा कोई फर्क नहीं पड़ता।
- 37:34बात तो सिर्फ पैदल किया है। तुम पैडल को मारना छोड़ दो, एक
- 37:44जगह पे बैठ जाओ, शांति से बैठ जाओ जैसे तुमने पैडल मारना छोड़ा था
- 37:51और साइकिल चल रही थी। ऐसे ही तुम्हारा मन भी चलेगा,
- 37:54थोड़ी देर के लिए घबराना मत। तुरंत ही पेटल बंद करते सा साइकिल
- 38:04नहीं रुकेगी, पेंडुलम भी रुकेगा। बस तुम इसे मोमेंट में मत लो।
- 38:17तुम्हारी शक्ति से ही चलती है साइकिल और तुम्हारी शक्ति से ही
- 38:24चलता है। पेंडुलम थोड़ी देर के लिए ठहरा
- 38:30हूँ। धीरज रखो और तुम्हारा धीरज ही काम
- 38:38करेगा। सारा धैर्यम भगवान कृष्ण का
- 38:48परमात्मा तक पहुंचने के डंक हैं। अमानित्वं दंभित्वं अहिंसा शांति
- 38:55राजवं आचार्यों, उपासनम, सौचुम्, स्थैर्यम स्थैर्यम आत्मा विनग्रह
- 39:04स्थैर्यम याने धैर्य स्थिरता ठहर जाओ।
- 39:13दौड़ो मत तुम आसन में तो बैठ जाओगे लेकिन मन दौड़ेगा फिर उस
- 39:20अवस्था में क्या करू? साइकिल तो चलेगी बैटल मरने छोड़
- 39:23दिया तो फिर इसे दौड़ने दो। और तुम आराम से बैठे रहो, तुम
- 39:32देखोगे कि तुम अपने भीतर जाना शुरू होगा धीरे धीरे धीरे धीरे
- 39:36अपने भीतर उतरो और एक वक्त ऐसा आएगा जब धीरे धीरे भीतर उतरना
- 39:45तुम्हें इतने गहरे तन पे ले जाएगा।
- 39:50जहा सैकल बिल्कुल रुख के लड़म से गिर जाएगा।
- 39:59मैंने कहने में तो कुछ मिनट ही लगाए, लेकिन जब तुम प्रयोग करोगे
- 40:08तो कुछ साल भी लग सकते है। यह मन का स्वभाव है, संस्कार है,
- 40:15मन है, बिचुअल हो गया है, एडिक्टेड हो गया है, दौड़ने का,
- 40:19इसकी एडिक्शन को तोड़ने के लिए वक्त चाहिए और यह तो जन्मो जन्मो
- 40:24से एडिक्टेड है, इसलिए वक्त लगेगा, घबराना मत।
- 40:29इसलिए एक कृष्ण कहते हैं स्थैर्य में धीरज रखना उतावला मत, पंज
- 40:38छोड़ दो, जल्दबाजी मत करना, अभी हो जाए, मैंने तो पैडल मारना छोड़
- 40:44दिया नहीं। यह पैडल मारना तुम्हारे सारे जीवन
- 40:52का संस्कार है, जन्मों का संस्कार है, पिछले जन्मों का संस्कार है।
- 40:59तमाम जीवनों में तुमने पैडल ही तो मारा है।
- 41:04एक दम से कैसे छोड़ दोगे? ये तुम्हारा संस्कार बहुत गहरा
- 41:09चला गया और मारना की सेह पुत्री तुमने कहा आज का जन्मदिन मेरा
- 41:16मरमदिन बन जाए, यह जो भीतर तुम्हारा चेतन के बाद में अचेतन
- 41:22मन है। उसमें वासनाएँ भरी पड़ी इस जन्म
- 41:29की भी है और पिछले सारे जन्मों की पोटली तुम साथ लेकर आते हो इसको
- 41:38मारना है। इसको खाली करना है।
- 41:42इस टोकरी में जो भी कुछ है वो कूड़ा है।
- 41:49इस बाल्टी को किसी कूड़ेदान में गिरा देना और इस बाल्टी को खाली
- 41:54कर लेना अभी तो हमारा चेतन भी भरा है सोचनाओं से।
- 42:01अभी तुम्हारा अचेतन भी भरा है। सूचनाओं से, वासनाओं से, इच्छाओं
- 42:06से, कल्पनाओं से, सूचनाओं से, विषयों से, तुम्हारा मन भी भरा
- 42:14है, चेतन भी, अचेतन भी, अवचेतन भी ये तीनों भरे पड़े हैं।
- 42:24अचानक से यह खाली नहीं होने वाला। सुबह उठो क्रिया योग करो पूछे
- 42:33ऊंचे लंबे लंबे सांस लो, नाक से सांस लो, लंबा सांस लो, सांस तो
- 42:38वैसे भी तुम्हें लेना पड़ेगा। तो जितना फेफड़ा बनाया परमात्मा
- 42:44ने बड़े ढाँगे से बनाया पूरा फेफड़ा भरना और फिर उसे नाक से
- 42:54सांस ले के फेफड़ा भर लो और मुख से +2।
- 42:58साधारण प्रक्रिया है। नाक से सांस लो, मुख से छोड़ दो,
- 43:06नाक से सांस लो, मुख से छोड़ दो, ऐसा जितना भी तुम आराम से कर सकते
- 43:12हो, लोग तो 2 घंटे करते हैं, मैं भी 2 घंटे करता था 40 वर्ष तक में
- 43:172 घंटे। यह क्रिया योग करता रहा और
- 43:24तुम्हारा चेतन अवचेतन सबकॉन्शियस, अचेतन अनकॉन्शियस यह खाली हो
- 43:31जायेगा। क्रियायोग करने के बाद आराम से
- 43:38बैठ जाओ। फिर वो सारा कूड़ा कबाड़ा जो
- 43:41तुमने इकट्ठा किया बाल्टी में वह बाहर निकलेगा, घबराना मत, यह
- 43:51कूड़ा है। तुम कहोगे ये कहाँ से आ गए तुम
- 43:54मृत्यु का भय। भाई तुमने मृत्यु का व्यय दबाया
- 43:58है जो भी कुछ तुमने दबाया है, वह कैथोड से होगा।
- 44:03जो भी तुमने दबाया, जो काम था जो क्रोध था, जो रोग था मोह था अंकार
- 44:11था भय था। मत्था, मत्था, अहंकार वो सब बाहर
- 44:20निकलेगा, लेकिन उसे सहजता से निगरने देना और तुम अपनी सिर्थता
- 44:25में बैठे रहना, ध्यान रखना, तुम शरीर ध्यान रखना, तुम ये मन पर
- 44:32नहीं हो। तुम ऐसी बाल्टी हो जो कूड़े से
- 44:42भरी पड़ी हो, तुम महज ये बाल्टी कूड़े से खाली करना।
- 44:52और यह कूड़े से खाली होगी। कैथोर से होगा क्रिया योग के
- 44:56द्वारा लंबे श्वास लोग नाक से लंबा श्वास छोड़ो, मुख से बार बार
- 45:04यह क्रिया करो। वैसे भी जीवन के लिए प्राण वायु
- 45:07है। कोरोना में बहुत से लोग।
- 45:11इसके बगैर मर गए ज्यादा भी ले लोगे तो कोई नुकसान नहीं है।
- 45:16इसका यह प्राण वायु है, प्राण शक्ति है इसको ज्यादा से ज्यादा
- 45:22मात्रा में भीतर फेंचो पेड़ पौधों के पास जाओ हरियाली गंडली में।
- 45:31जहाँ पर बहुत से पेड़ पौधे हैं वहाँ जाकर लूँ भी, लम्बी सॉस लूँ
- 45:38और फिर आराम से बैठ जाओ, धीरज रखो अगर कुछ न्यभी हो।
- 45:49कुछ कूड़ा बाहर न निकले तो कोई बात नहीं, यह कूड़ा है।
- 45:54आएगा 1 दिन फिर धीरे धीरे कूड़ा निकलेगा, फिर घबराना मत, कंपन
- 46:02आएगा, मृत्यु का भय आएगा ये तुमने सब दबाया था सबसे ज्यादा हम।
- 46:08मृत्यु का बेहद और जो भी हमने दबाया, वह हमारे चेतन में आएगा।
- 46:18अब चेतन से चेतन में आएगा। फिर और गहरा मृत्यु का भाव अगर
- 46:23अचेतन में डीप चला गया तो? फिर बाद में वह भी आएगा।
- 46:28लेकिन मृत्यु का यह भय इसको निकल जाने देना कैथोरेसिस और ध्यान
- 46:35रखना कैथोरेसिस का एक ही मार्ग है वो है चेतन मन चेतन मन से निकलेगा
- 46:45ये सारा कूड़ा। कुछ तुम्हें दिखेगा, बस दिखेगा तो
- 46:52तुम गबरा मत जनो और इसके संग मत हो लेना।
- 46:58मृत्यु का व्यय भी आएगा, लेकिन ध्यान रखना मृत्यु का व्यय है।
- 47:02मृत्यु नहीं है, तुम मरोगे नहीं। ये मात्र व्यय जो तुमने दबाया था
- 47:10कभी जो तुमने किया था कभी काम वासना भी आएगी, क्रोध भी आएगा,
- 47:17लोप भी आएगा, मंह भी आएगा, अहंकार भी आएगा, मद भी आएगा मत, सर्ब भी
- 47:21आएगा। सब आएगा, त्याग भी आएगा सब चीजों
- 47:31को गुजर जाने देना, मैं ये सोच कर उसके दरिसे।
- 47:43उठा सा के वो रोक लेगी, मना लेगी मुझको हवा में लहराता।
- 48:01आता था दामन के दामन पकड़कर बैठा लेगी मजदूर कदम ऐसे अंदाज से।
- 48:21उठ रहे थे की आवाज़ देकर बुला लेगी मुझको मगर उसने रोका।
- 48:39ना उसने बैठाया ना दामन ही पकड़ा, ना मुझको बुलाया ना आवाज़ ही दे।
- 48:58ना वापस बुलाया मैं आहिस्ता आहिस्ता चलता ही आया यहाँ तक के
- 49:15उससे। जुदा हो गया।
- 49:19मैं जुदा हो गया। मैं जुदा हो गया, बड़ी इच्छाएं
- 49:31आई। आवाज देख कर बुला लेगी, पहुंचा
- 49:43पकड़ के बैठा लेगी, मेहनत करेगी, खुशहामत करेगी लेकिन किसी भी चीज़
- 49:55की अपेक्षा मत करना। इनसे जितनी जल्दी पिण्डा छुड़ाया
- 50:02जाए, जो आपने भीतर सुप्रश किया है, उतना ही तुम खाली रहो, खाली
- 50:09होने की इच्छा रखना, धीरे धीरे यह कूड़ा।
- 50:15कूड़ेदान में कर जाएगा और तुम्हारी बास्कट खाली हो जाएगी
- 50:20बास्कट अंतर्मन वह अभिचेतन सब कौन से सर कौन सब कौन से सर
- 50:26अनकॉन्शसमन और जैसे ही वह खाली हो गया, तुम जो चाहती हो ना बेटी के
- 50:34मर जाऊं। बस तुम मर जाओगे, फिर सभी वासनाएँ
- 50:39गिर गईं। वो कूड़ा था।
- 50:42जीने की इच्छा भी कूड़ा है। मरने की इच्छा भी कूड़ा है।
- 50:47दोनों कूड़ों को घरा दो बास्केट को खादी कर दो।
- 50:54और आराम से चलते जाओ, ज़िन्दगी को अपनी सहजता में बहने दो, सहजता
- 51:04में बहने दो न तुम जीने की इच्छा रखो, न तुम मरने की इच्छा रखो और
- 51:10तुम 1 दिन पाओगे। जैसे साइकिल 1 दिन ठहर जाती है और
- 51:14दम से घर जाती है, वैसे ही तुम्हारी भीतर की ये बास्केट
- 51:22कूड़े से खाली होते ही तुम्हारे मन के भीतर, कैथोड से सोने का कुछ
- 51:28बचेगा ही। यह बास्केट खाली हुई।
- 51:33और तुम गहन शांति मौन में चले जाओ अब बाहर कथा से होने के लिए कुछ
- 51:39वचन वो क्षण होगा आनंद का और तुम अपने आप में उस मध्य बिंदु में
- 51:47ठहर जाओगे जिसकी मैंने बात की थी। जो परम सुखदायी है, जो परम आनंद
- 51:54दाई है जो परम खुशबु से युक्त है जो मदहोशी के आलम में लिपटा हुआ
- 52:01है, जो रस है जो आनंद की धारा है, अखंड धारा है वो कभी टूटती नहीं
- 52:08जिन्हें नशे जहाँ के उतर जान पर बात।
- 52:14बाकी नशे उतर जाएंगे उस सिंथेटिक हों या अल्कोहोलिक हों वो सत्ता
- 52:23के हों, वो गद्दी के हों वो मान सम्मान के हों सब नशे, उतर जाएंगे
- 52:28नाम, खुमारी नान काचड़ी रहे दिन रात।
- 52:32लेकिन जैसे तुम अपने भीतर उतरोगे वह एक गुंजार होगा जीसको अनहद
- 52:39गुंजार कहते है उस खुमारी में तुम डूब जाओ, यही तुम्हारा अंतिम
- 52:45ध्येय है नाम खुमारी नानक छड़ी रहे दिन रात।
- 52:50और ये अनंतनाथ जी से शुरू हो जाता है।
- 52:53वह दिन भर रात चलता ही रहता है और खुमारित में चढ़ी ही रहती है।
- 52:59इस नाम के चक्कर पचड़े में मत पड़ना भगवान का कोई नाम नहीं
- 53:04होता। शब्दों के नाम होते हैं, भगवान का
- 53:09कोई नाम नहीं होता। शब्दों के पचड़े में मत पड़ जाना,
- 53:14अस्तित्व के उस आयाम को छू लेना जहाँ स्वर्ग ही स्वर्ग है, जहाँ
- 53:21रस ही रस है, जहाँ जीवनधारा बहती है।
- 53:25जहाँ आनंद के फूल खिलते हैं जहाँ सभी सुगंधियां विराजमान हैं वहीं
- 53:31चले जाना और तुम पाओगे कि ना अब जीने की इच्छा रही ना वो मरने की
- 53:39इच्छा रही फिर क्या होगा? फिर जो होता है वो होने दो।
- 53:49फिर जो होता है हमें तो मेरी तो यही मर्जी मेरी तो यही अर्जी कर,
- 53:59वो ही जो तेरी मर्जी तेरा प्राण मीठा लगा है।
- 54:10जो तुध पा वे सोइपलिका तू सदा नरक तू सदा नरकर निराकार तू सदा सलामत
- 54:23निरंकर। वह गहरा आनंद बास्केट के खाली
- 54:32होने से मिले मन शून्य हो जाए। यह मन ही जा था जो तुम्हें तंग
- 54:39करता था। अब इसकी धारा टूट गई।
- 54:46अब तुम्हें कोई सताने नहीं आएगा। अब तुम चैन से आराम से उस मौत में
- 54:55सोना सोए हुए थे, चैन से ओढ़े हुए कफन।
- 55:01सोए हुए थे चैन से ओढ़े हुए कफन यहाँ भी सतानी आ गए।
- 55:06किसने पता बता दिया फिर तुम्हे कोई शब्द तंग नहीं करेगा, फिर
- 55:12तुम्हे कोई वासना तंग नहीं करेगी। ना मरने की, ना ये निक बस फिर जो
- 55:17होता है होने दो सहज है। प्रकृति जो करती है उसमें राजी हो
- 55:24जाओ। उसके बाणे में चलो जो होता है
- 55:32होने दो, तुम अपने आप में सिधर खड़े रहो।
- 55:41तुम कपो मत, तुम डरो मत, तुम सिर्फ उस रस में उतर के उस रस का
- 55:49पान करो और तुम पाओगे तुम धन्यवाद।
- 55:56फिर न जीने की तमन्ना रही, न मरने की तमन्ना रही, न कुछ पानी की
- 56:02तमन्ना रही, न कुछ खोने का भय, राह वो ही है असली आनंद और वो ही
- 56:11है सच्चा परमात्मा। बाकी तुम्हारी परमात्मा न करी।
- 56:15मैन मेड हैं। गॉड मेड तो सिर्फ एक ही है, वो
- 56:22यही है जब तुम्हारी सब वासनाएँ इच्छाएं खो जाती हैं, वो अच्छी या
- 56:27बुरी वासना से रहित हो जाना इक्षणों से रहित हो जाना तुम्हें
- 56:32असली। आनंद प्रदान करता है।
- 56:35ईश्वर करें तुम उस आनंद के गहरे रस को छु पाओ, तुम उस आनंद के
- 56:44गहरे रस को पी पाओ और निहार हो सको।
- 56:54वह अकाल व्रत वह सत्य चित आनंद हम कहते हैं सिख धर्म में जो बोले सो
- 57:06निहार वो निहाल हो जाता है सत्य श्री अकाल।
- 57:13वह अकाल पृक है, वह कभी काल की भेंट नहीं चढ़ता।
- 57:17वह निरंतर है, अखंड धारा है, आनंद की कभी खत्म नहीं होता।
- 57:28धन्यवाद।