Latest / Baba ji Vijay Vats / 6 Nov 25 - जो लोग कुकर्म करते हैं वह ऐश करते हैं, और हम हैं पुण्य करते हैं फिर भी दुखी हैं! क्यों? Baba Ji Vijay Vats Satsang
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- 0:02प्रणाम बाबा जी जो लोग कुकर्म करते हैं वो ऐश करते हैं।
- 0:24शराब पीते हैं, मांस खाते हैं शराब सवा कबाब।
- 0:44और हम हैं के पुण्य करते हैं मुट्ठी भर बाजरा कनक चावल पंछियों
- 0:54को डालते हैं। तेल, चावल, शक्कर, कीड़ों को
- 1:00डालते हैं। एक टोकरा भर गायों को हरा खिलाता
- 1:12है, लेकिन हम फिर भी दुखी है जो काला धंधा करते है।
- 1:25जो बुरे काम करते है वो शराब पीते है, मौज उड़ाते है, कबाब खाते,
- 1:42मौज उड़ाते है, शबाब से खेलते है। ऐश करता है, फिर कोई क्यों
- 1:59परमात्मा को याद कर लेता? फिर ऐसी ही तो करेगा अजवा बनाने
- 2:13के? जन्म के उपलक्ष में एक महान
- 2:21विभूति जो संसार को शांति के अमूल्य सूत्र देख है।
- 2:34मैं आपसे स्वाद जो काला धंधा करते वो मौज करते ऐश करते शराब शबा कबा
- 2:51और जो पुण्य करते गांव को चेहरा डालते हैं, चोगा डालते हैं।
- 2:58कीड़ों मकोड़ों को तले चाब शक्कर डालते हैं और दुखी कर्जदार हैं,
- 3:10तकलीफ में हैं, तंगी में हैं क्षमा करना बाबा।
- 3:21क्या करूँ, वक्त के हाथों में लाचार हूँ सत्य जुबान पर आ ही गया
- 3:35और कम से कम आज के। दिहाड़ी में तो सत्य नहीं आना
- 3:40चाहिए था, परंतु आपसे पूछ ही लिया है।
- 3:52सभी जीवों का कल्याण करने वाले हैं, परमपिता परमात्मा।
- 4:00मुझे इस शिनशय से निकालिए आप कहते हैं कर्मों का प्रतिफल आता है यह
- 4:13कैसा प्रतिफल? काला धंधा करें।
- 4:20याशी करे पुण्य करे श्वेत उज्वल काम करे वह दुखी त्रस्त, पर मैं
- 4:36इतना शरीफ और गरीब हूँ कि कोई भी आके।
- 4:40मुझे गाली निकाल दे, तू प्रभु मेरी समस्या की निवृत्ति के छाये
- 4:53देना बंधु मथुरा से। ये प्रश्न तुम्हें बहुत पहले कर
- 5:12देना चाहिए था। खैर, मैं इसे अपने ग्रंथ में
- 5:20शामिल कर लेता हूँ। जो काला धंधा करते है वो ऐश करते,
- 5:34मोज लूटते है, शराब पीते है, कबाब खाते है, शबाब लूटते है।
- 5:53पुत्र दीन बंधु कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम्हारे मार्गदर्शकों ने ऐश
- 6:04का मतलब ही न समझाया हो? ऐसा ही है।
- 6:11तुम्हारे मार्गदर्शक बिलकुल प्रेमानंद जैसे मूर्ख मोर एक गांव
- 6:27से रात को हाथी निकल गया था। सुगहा लोगों ने देखा इतने बड़े ये
- 6:42कौन सा जानवर कभी देखा ना था ऐसे हैं।
- 6:51तुम्हारे मार्गदर्शक धर्म उपदेशक हैं, जिन्होंने वो तर्क देखा है
- 6:58आचार्य जयस कब आईएस किया? कब कॉम्पटीशन लड़ा?
- 7:08कब कुर्सी मिली, कब त्याग दिया, तू अपने भीतर कब गए?
- 7:16जब इनसे मैं पूछता हूँ कि वेला बताओ, वो खाली लम्हें बताओ?
- 7:25और खाली लम्हों के बिना उसका सुरूर चखाने का जब तुम अपने भीतर
- 7:31गए यू वर ऑलवेज बीज़ी सदा ही तुम व्यस्त थे ए व्यस्त कब होवे?
- 7:41जिन लक्षणों में तुम अपने भीतर उतरें।
- 7:46डिग्रीज़ कमाई कुरसी कमाई। हुकुम किया और छोड़ दिया क्योंकि
- 8:00इस दिशा में। ज्यादा ऑपर्च्युनिटी थी तो इधर आ
- 8:07गए, सड़कें नहीं हुआ करती थी। रेतीली धरती थी, इतनी बड़ी बड़ी
- 8:18पैडिंग देख कर गांववाले सब इकट्ठे हो गए।
- 8:24किसी की समझ में नहीं आया तुम वाहनों पर एक तुम्हारे
- 8:32मार्गदर्शकों जैसा मार्गदर्शक था लाल बुजक्कड़ लाल बुजक्कड़।
- 8:43उसके पास गए कि ये तो सभी समस्याओं को सॉल्व कर देगा।
- 8:52चलो बाबा लाल बुझकर आओ तुम्हें दिखाएं ये पेड़ें किसके।
- 9:01लाल बुझक्कड़ हँसा। बोला समझने वाले समझ गए क्या
- 9:15समझे? अंजान पांव चाकी बांध के।
- 9:21कूद गए मृगाण मृगाण हिरण को कहते हैं, मूर्खन क्या समझेंगे?
- 9:30समझने वाले समझ गए ये तो मृग पांव में चाकी बांध के कूद गए, बस मृग
- 9:40ही होते। हैं।
- 9:44इतनी बड़ी पैडिंग कहाँ से आए तो पांव च्याकी बांध के कूद गए।
- 9:50भृगु गान हल हो गया, समस्या का गांव वाले चुप हो गए, ठीक समस्या
- 9:56का हल हो गया। ऐसे हैं तुम्हारे धर्मों के शक
- 10:04पाखंडी तुम कहते हो बाबा जो काला धंधा
- 10:19करते हो ऐश करते हो कबाब शराफ शबाब।
- 10:34अब बेटा अच्छी तरह से कान खोल लो, हृदय को भी खोल लो।
- 10:44नब्ज को भी खोल लो शब्द बड़ा प्रश्न बड़ा प्यारा है।
- 10:55काबिले तारीफ है और काबिले व्याख्यान है।
- 11:00इसलिए मैं कहता हूँ तुम्हें पहले पूछना चाहिए था हमारे शास्त्र
- 11:09कहते हैं कि परमात्मा के घर देर है अंधेर है।
- 11:19यही गलती खा जाते हैं। बुनियादी सिद्धांतों में से एक है
- 11:24कि परमात्मा के घर धरे नहीं हैं अंधेर की तो बात।
- 11:29छोड़ दो क्या होगा अगर सूरज 5 मिनट लेट हुआ?
- 11:40और सूरज 5 मिनट पहले चुप रहा, क्या हुआ?
- 11:48ग्रह तारे नक्षत्र आकाशीय ब्राहमंडीय।
- 11:54ये सारा यूनिवर्स अपनी चार बदल दे, जो खोजा तुमने उससे विपरीत
- 12:02चलने लगता है। अभी एक छोटी सी खोज और
- 12:07साइंटिस्टों के वजह खराब हो गए। सूरज की फूटान के कण हम पहले कहते
- 12:22थे एक तरह से व्यवहार करते है, वही साइंटिस्ट रहने लगे।
- 12:30नहीं यह पार्टिकल। की तरह भी व्यवहार करते हैं या
- 12:36तरंग की तरह भी व्यवहार करते हैं और जो जानते हैं वो यह भी जानते
- 12:42हैं कि पार्टिकल और तरंग में बड़ा असर करते हैं।
- 12:52लेकिन फ़ोटॉन पार्टिकल भी है और तरंग भी है।
- 12:59कैसे समझा पाएंगे? ये सब अंदाज़े हैं एस्टीमेट्स
- 13:08हैं। ऐक्युरेसी कहीं भी नहीं।
- 13:12तो फिर अक्यूरेसी मिलेंगे कहाँ है?
- 13:16हाँ ये बताऊँगा तुमने कहा पुत्र काला धंधा करते एस करते।
- 13:37हम पंछियों को कीड़ों को गायों को खाना खिलाते हैं।
- 13:43हम दुखी हैं अगर यकीन हो कि वह है।
- 13:56मैं परम गरीबी की हालत में पंछियों को चौका डालता और पैसा
- 14:03ब्याज के ऊपर लेके डालता हमारे शहर में यहाँ एक ब्याज पर पैसे
- 14:10देने वाला व्यक्ति। बड़ा मशहूर था सभी झांक के अभी मर
- 14:13गया देवा वाणिया कैसे थे उसको ब्याज के ऊपर पैसे पकड़ता और मुझे
- 14:26देखते ही माथे पे हाथ मरता। है।
- 14:29तुम जैसा मूर्ख व्यक्ति मैंने नहीं देखा।
- 14:36मैं उससे कहता देख सेट तेरे पैसे वापस होते हैं हाँ, ₹2 सीकड़ा का
- 14:42पेस ब्याज वापस होता है हाँ, तो फिर तू मुझे मुँह क्यों कह रहा?
- 14:48कहते हैं यही तू मुँह रख कह रहा हूँ।
- 14:52घर में रोटी न हो उसके लिए पैसे मांगे जचती है बात घर में श्रावण
- 14:59न हो उसके लिए पैसे मांगे जचती है बात किसी का कर्ज उतार न हो उसके
- 15:05लिए पैसे मांगे बात जचती है वो पंछियों को।
- 15:11जिसके बिना सड़ सकता है, चल सकता है काम और पैसा नहीं है तो डायल
- 15:16कर दे मैं इनका सेट 2300 में कभी नहीं आएगा तो मर जाएगा तो सड़ सड़
- 15:27के मरेगा। लेकिन तेरी समझ में कभी नहीं आएगा
- 15:33और वही बात हुई टेनसराइट से उस साइड कैमरा और उसकी समझ में कभी
- 15:38नहीं आया। बहुत से लोगों को मेरी ये बात
- 15:43जैसे। मैं अक्षरी कहा करता हूँ।
- 15:52खूब खर्च कर और खूब कमाई अर्न मोर एंड स्पेन पर।
- 16:06तुम कहे तो नी। मुट्ठी बांधो मुट्ठी बांध के खर्च
- 16:12करो जो परमात्मा पे यकीन रखता है और मुझे बड़ी कच्ची उम्र में उसके
- 16:21होने का यकीन होगा कोई उम्र थोड़ी होती है 1917 में मात्र।
- 16:2618 वर्ष के थे। यह बात कच्ची उम्र होती है।
- 16:32बाली उमरिया ट्रेन इंसिडेंट ने मुझे उसके होने का सबूत दे दिया।
- 16:42बुद्धि चरमरा गई। बुद्धि के सब।
- 16:45तर्क कृपा है। आज भी मेरे बायोग्राफी को जब लोग
- 16:50पढ़ते हैं तो मुझे कहते हैं बाबा इससे फेंकने का भी मन करता है।
- 16:59इससे पूजने का भी मन करता है। मैंने कहा क्यों इसमें ऐसी बातें
- 17:08लिखी हैं? अगर वो सच है तो पूजने का मन करता
- 17:13है। अगर वो सच नहीं है तो गंदे नाले
- 17:17में फेंकने का जी करता है। मैंने कहा तू गंदे नाले में है
- 17:22फेंक दे। क्योंकि तुम्हारे लिए ये कूड़ा ही
- 17:27है, इसलिए मैं तुमसे कहता हूँ कि संसार में आए सभी ग्रंथ पढ़े,
- 17:36नास्तिक हो, आस्तिक? मेरी इस किताब को जरूर पढ़ लेना
- 17:49नहीं तो जैसा संसार में आए वैसा चले गए।
- 17:56तुम चाहे आस्तिक हो, तुम चाहे आस्तिक हो, यू मस्ट रीड दिस का?
- 18:03छोटी सी किताब एक रात में खत्म हो जाएगी एक नवल कत्र है जैसे
- 18:09उपन्यास पढ़ते थे हो आप और ऐसी इंटरेस्टिंग है ये क्या पढ़ते ही
- 18:14चले जाओ? देर है, अँधेर नहीं, नहीं, उसके
- 18:29घर देर ही तो नहीं है, वह ऐसा श्रमदार कारीगर है कि उसकी संरचना
- 18:38में देर बिलकुल भी नहीं होती। यही तो तुम गलती खा गए और गलती
- 18:44इसलिए खा गए। के जिन्होंने ये शब्द कहे वो उस
- 18:49स्थल पर नहीं पहुंचे। जब आँखों से नहीं देखा तो सत्य
- 18:57नहीं बोला जाएगा, झूठ ही बोला जाएगा।
- 19:00लिखा लिखी के है नहीं देखा देखी बात?
- 19:07उस मुकाम पे जाना अनिवार्य परमात्मा के घर देर नहीं है।
- 19:27लेकिन तुम कहते हो जो पाप करते हैं, वो तो ऐश करते हैं।
- 19:36जीस दिन परमात्मा के अगर देर हो गई उस दिन सब कुछ भ्रष्ट हो
- 19:42जाएगा, प्रजा आ जाएगी वह कुशल कारीगर।
- 19:50देर ही तो नहीं करता, यही तो उसका स्वभाव है, यही तो उसकी खासियत
- 19:55है। विशेषता है देर ही नहीं करता वो
- 20:01और मेरी बात को ठीक से समझ लेना। पुत्र जीस दिन उसके घर देर हो गई।
- 20:08उस दिन मैं ये क्यों कहता हूँ क्योंकि मैं जानता हूँ अब
- 20:20तुम्हारे प्रश्न के ऊपर आजाऊ तुमने जो देखा है?
- 20:33तुम्हारी आँखों के आगे पर्दा है, तुम सत्य को देख नहीं सकते एक
- 20:43मायने में अभी तुम अंधे हो जब तक व्यक्ति उस स्तर पर जाता है।
- 20:50तब तक उसे आँखें नहीं मिलती उस स्थल पर जाने से ही आँखें नसीब
- 20:56होती हैं इसलिए वेद उपनिषद करीशी कहता है।
- 21:04हे प्रभु तमशो माँ जो दुर्गम ए। अभी अँधेरा है, अभी मैं अंधा हूँ,
- 21:15तुम सो माँ जो तर्क मैं मुझे वहाँ ले चल जहाँ आँखें मिल जाएं,
- 21:23ज्योति दिखने लगे, अंधे को ज्योति नहीं।
- 21:26दिखता। अभी तमस में हूँ यानी मैं अंधा
- 21:29हूँ और तुम तब तक अंधे रहोगे। इन आँखों के होते हुए भी तुम अंधे
- 21:40रहोगे जब तक तुम्हें वे आँख न मिल गई जिनकी मैं बात करता हूँ।
- 21:47जो दिव्य शक्षु अर्जुन जो दिव्य शक्षु बरबरी इनको प्रदान किए गए
- 21:53कृष्ण भगवान के द्वारा। देर उसके घर है नहीं, जो काला
- 22:10जिंदा करते है वो एआरसी करते है, हम श्वेत धंदा करते हैं, वह बनाने
- 22:23के लिए श्वेत धंदा किया क्या? कारोबार के लिए पिता ने रुपए दिए
- 22:32थे, काला धंधा नहीं किया, श्वेत धंधा किया, भूखों के पेट भर दिए।
- 22:40इससे ज्यादा श्वेत धंधा और क्या हो सकता है?
- 22:43तुम भी तो यही करते हो गायों को चारा?
- 22:50पक्षियों को दान कीड़े मकौड़ों को दान पेट भर देते हो।
- 22:55भूखों का यही तो श्वेत जिंदा है। यही तो बाबा नानक ने किया।
- 23:07फिर क्या वो दुखी रहो, बाबा नानक दुखी रहो नहीं बाबा नानक जीतने
- 23:17आनंद में हैं इतने तुम्हारे बड़े से बड़े रईस।
- 23:21उनके पांव के नाखून की धूल के बराबर हैं।
- 23:27तुम धनपति होगे, तुम्हारे पास बहुत बड़ी गद्दियाँ लाखों लोग
- 23:35तुम्हारे हुक्म की पालना करते होंगे।
- 23:40तुम्हारे पास सुख के सारे साधन हो गए।
- 23:43सोने के शाइन कक्ष होंगे। तुम्हारे और कुछ पागलों ने सोने
- 23:50के टॉयलेट्स बना रखे हैं। सब होगा तुम्हारे पास, ये सोने के
- 24:07टॉयलेट्स वाले मरेंगे बाबा सिर से।
- 24:09तुम देख ले। हस्ते का?
- 24:18तो वे सेठ मुझे कहता हूँ, तुमसे बड़ा पागल मैंने नहीं देखा।
- 24:23मैंने कहा अच्छी बात। है।
- 24:27सही भी है। क्योंकि इससे पहले मैं भी
- 24:35तुम्हारे जैसा था ही था। यह तो उसकी नगरी मोख गवार उसकी
- 24:44नजर हो गई और पैसा नहीं है तुम देखना।
- 24:56तुम्हारा अब तक का चुकती हुआ ब्याज समय चुकती हुआ।
- 24:59ना हाँ हुआ आगे भी चुकती हो जाएगा तुमसे कर मत करो और चुकती हुआ।
- 25:16तुम कहते हो काले धंधे करने वाले सुखी होते हैं।
- 25:21मैंने ऐसे ही लोगों का जिक्र कर रहा हूँ सड़ सड़ के मराव उसके।
- 25:32बच्चों ने उसे सामने वाले प्लॉट में घेर दिया।
- 25:38कोई पट्टी नहीं, दुर्गंध आती, उसके कैंसर राइटिस में से दुर्गंध
- 25:44आती और मुझे मेरा सेवक पूछता कि पट्टी के लिए बुलाया जाऊं?
- 25:51कि ना जाऊं? बाबा मैंने कहा जरूर जाओ बेटा,
- 25:55यही वक्त है। ये वक्त पुण्य का वक्त है, उसका
- 26:01कोई नहीं और जिसका कोई नहीं होता तब जो काम आता है उसको बड़ा पुण्य
- 26:10का भाग मिलता है। जैसे बाबा नानक को मिला।
- 26:16भूखे थे, कितने दिनों से भूखे थे, किसी के भीतर परमात्मा न उतरा और
- 26:25उतरा तो उसी के भीतर उतरा, जिसके भीतर उतर सकता था, बाबा नानक के
- 26:31भीतर उतर सकता था, उसके भीतर उतरा, तुम कैसे हो बाबा?
- 26:35हम पर भी फेंक दो तुम्हारे ऊपर उतर सकता है तुम गंदे नाले हो तुम
- 26:42गट्टर हो तुम्हारे भीतर अगर देसी घी फेकूंगा तो याद रखना, तुम तो न
- 26:49शुद्ध हो पाओगे। देसी घी खराब हो जाएगा।
- 26:54इससे सारा कुछ ही मैंने समझा दिया तुम्हें कर्मों की बड़ी शानदार
- 27:02व्यवस्था पूछ ली पुत्र तुमने? हैलो अब थोड़ी सी आँखें कान दिमाग
- 27:21के नुरोंज। खोल लो हृदय को भी।
- 27:24खोल। लो।
- 27:27यह सत्य तुम्हारे आगोश के अंत स्तन में चला जाना चाहिए।
- 27:35क्योंकि यह है सत्य शराब पीने को तुम आशिक कहते हो
- 27:54शांति से सोचना मेरी बात को जो आनंद बिना पिए।
- 28:07संत की आवाज़ में होता है कोई शराब की आवाज़ में होता है, शराब
- 28:15पीने को तुम एस कहते हो, शराब पीने को तुम एस करते हो।
- 28:38ऐश तो बाबा नानक लेते है जड़ी बिन पीते आ चढ़ जावे, तुम्हारे ठेकों
- 28:50की शराब नहीं पीते हो? ये तो तुम्हारा दुर्भाग्य।
- 28:55है। तुम इसको ऐश कहते हो?
- 28:59इसलिए शास्त्रों ने मना किया तुम इसे ऐश कहते हो?
- 29:16क्षणिक घंटे 2 घंटे के लिए बेहोशी को अपने ही हाथों से अपना लेना
- 29:24तुम इसको ऐश करते हो? घड़ी दो घड़ी के लिए तुम बेहोश हो
- 29:29जाते हो उसको तुम ऐश कहते हो, अपनी काम ऊर्जा को बाहर फेंककर।
- 29:45एनर्जीलेसनेस की अवस्था में धकेले हुए।
- 29:49तुम सो जाते हो, तुम इसे शबाब का ऐश करते हो।
- 30:00तुम्हारा धन, तुम्हारे खजाने तुम्हारे।
- 30:03लॉककर के भीतर रखे हुए स्वर्ण आभूषण, हीरे जौहरात मोती मण के सब
- 30:09बेकार हैं इस सबेरे की संपदा के। या तो क्या करें?
- 30:15पश्चिम ने सारी दुनिया का भाग्य फोड़ दिया।
- 30:19यह सेक्वेंट फ्राइड का आया। यह धरती के लिए एक नर्क बन जाता
- 30:25है इसलिए कहते हैं नीम हकीम खतराए जान आधे अधूरे वैद्य डॉक्टर के
- 30:36पास में चले जाएं। आधा अधूरा सेन्टेन्स हमेशा ही गलत
- 30:42प्रभाव और अर्थ दिया करता है। सेगमेंट फ्राइड क्या आया?
- 30:52आज उसके चेरे चट्टे पी एल आर करते घूम रहे हैं, बस पापी पेट का सवाल
- 31:03है। पैसा जोगना है, ऐश करते हैं, बाबा
- 31:12नानक ऐश करता है कोई एक व्यक्ति अभी मुझे बाबा कह रहे थे पिछले
- 31:25कुछ दिनों में। सात व्यक्ति इस धरती पे ऐश कर रहे
- 31:30हैं सात वरती शर्म नहीं आती तुम्हें शर्म नहीं आती?
- 31:39आठ अरब की आबादी में मात्र सात। लोग ऐश कर रहे हैं।
- 31:49ये बात कभी तुम्हारे भीतर अंतःस्थल को चीर के हमारे हृदय को
- 31:54पाडकर तुम्हारे स्वयं में प्रवेश नहीं की नहीं की इसलिए तो तुम
- 32:09बुझे बुझे मरे मरे लटके लटके? उजड़े उजड़े देखने वालों ने देखा
- 32:28है धुआं। देखने वालों ने देखा है धुंआ
- 32:42किसने देखा दिल मेरा जलता हुआ। देखने वालो ने देखा है धुआँ।
- 33:05दिन, बंधु तुमने धुआँ देखा है। यही तो गलती खा रही है सारी
- 33:14मानवता जिसे तुम ऐश कहते हो, वो आग के ऊपर से निकलता हुआ दुआ
- 33:25किसने देखा मेरा? जलता हुआ वो आग तो तुमने देखी
- 33:38नहीं इस धुएं के। पीछे आ गए।
- 33:47पहले के लोग जब रास्ता भटक जाते थे।
- 33:52सुर छिप जाता था। जंगली जानवर घूमना शुरू कर देते
- 33:57थे तो वो तलाश करते थे। और एक आवाज से सबूत मिल जाता था
- 34:06कि जहाँ कोई आदमी नहीं रहता है और सबूत क्या था दूमा।
- 34:12जहाँ कहीं दूर दराज देख लेते कोई राजा भटक जाता कोई राहबीर भटक
- 34:18जाता रात। को जो डाकू गिरोह सक्रिय हो जाते
- 34:27हैं। लुच्चे रफंगे बदमाश इसलिए रात को
- 34:36राक्षी शिव वेला कहा? गया तो दूर से देखते हैं देखो
- 34:52कहीं यहाँ धुआं नजर आता है। और अगर उन्हें कहीं धुआँ दिख जाता
- 34:59तो उनकी जान में जान। होती।
- 35:00फिर शुक्र है क्योंकि अगर धुआँ है तो आज भी है।
- 35:09फिर वो चले जाते, उन्हें आश्चर्य स्थल मिल जाता, भूखे पेट रोटी मिल
- 35:13जाते, भूखे कंठ प्यास के कंठ को पानी मिल जाता और रात भर को
- 35:19विश्राम। करने के लिए जगह मिल जाता।
- 35:24देखने वाले ने देखा है धुंआ तुम जैसे ऐश कहते हो।
- 35:30दुआ है बेटा मैंने 1000 बार कहा ऐश तो हम करते हैं पुत्र, देखिए
- 35:42कितनी बड़ी बात है। मैं कहता हूँ ऐश तो हम करते हैं।
- 35:49रोटी मैंने कहता घूमता मैं नहीं 8000 के जहाज 8000 करोड़ के जहाज
- 35:54पे, मैं नहीं बैठता फौरन में मैं नहीं जानता जाता, अच्छे दृश्य मैं
- 35:59नहीं देखता एक जगह आराम से बैठ। इतनी इतनी सी चाय ले लेता हूँ भला
- 36:10ये ऐश है फिर भी मैं कहता हूँ कि मैं ऐश करता हूँ, तुम अपने दुखड़े
- 36:17सुनाने सुनाते सुनाते अगाते नहीं और मैं अपना आनंद बांटते, बांटते
- 36:24थकता नहीं। अब देखिए फर्क क्या है?
- 36:32तुम जहाँ बैठ जाते हो रोना रोते हो दुखड़े सुनाते सुनाते तुम
- 36:38तुम्हारा जीरा नहीं मरता, सुना नहीं पाते और मैं आनंद में बांटते
- 36:44बांटते कोई थकता नहीं। कब से बांट रहा हूँ कभी शेकन आया
- 36:57मेरे चा मैं तुम्हें कहता हूँ मेरी शरण में आ जा, बस एक बार
- 37:06अंगूठा लगवा दे। तेरी जिम्मेदारी मेरी भला किसी का
- 37:11भाव उठाने के लिए कोई सहमत करता है कि नहीं?
- 37:18बस कृष्ण जैसे लोग ही सहमत कर सकते हैं क्योंकि परम करूणों से
- 37:22भरे हुए हैं, वो ही कह सकते हैं। छोड़ दें सभी धर्मों को
- 37:30सर्वधर्माण प्रतिज्ञमा में कम शरणम व्रत सर्वबेरी शर्मयाजा
- 37:38अहंतम सर्पपापे भवोंक श्यामी माँ सुचाह।
- 37:47मैं ही तुम्हें कह सकता हूँ मेरी क्षण में आ जाओ क्योंकि मैं ही
- 37:51एकमात्र जीवंत खिलाड़ी मैं ही हूँ वो आग जहाँ से निकलता धुआं और तुम
- 38:00धुएं को देख कर कहते हो। ये तो ऐश कर रहा है, तुमने देखा
- 38:07ही नहीं किसने देखा दिल मेरा जलता?
- 38:15हुआ। कल चमन था।
- 38:22आज इक सेहरा हुआ, देखते ही देखते ये क्या हुआ कल चाँद?
- 38:37थोड़ा उतरो तो बेकार, थोड़ा आओ तो मेरे पास।
- 38:43ये सेहरा गुलस्तां बन जाएगा, चमन बन जाएगा भाई थोड़ा उठा रखवा लो,
- 38:52चले जाओ बस फिर चाहिए ना मेरे? पास।
- 39:00मैं तुम्हारी मुक्ति का दायित्व अपने जिम्मे लेता हूँ, यहाँ ऐसे
- 39:12भी लोग हैं जो धोखा। देकर उच्च पदासीन हो जाते हैं झूठ
- 39:23बोलकर कपड़ तोड़कर। ये खर्तु का वो खर्तु का राजनीतिक
- 39:30और क्या करते हैं? मैं तुमसे एक बात बताता हूँ।
- 39:40जूठे कपड़े लूले लंगड़े, अपाहिज, बेकार लोग जो कुछ नहीं कर सकते
- 39:46वो। राजनीति हो जाती है।
- 39:52राजनीति ही एक ऐसा माध्यम है। हींग लगे ना फट पड़ी रंग भी चोखा
- 40:01दे जुबां ही लानी पड़ती है। मैं रोजगार दे दूंगा।
- 40:13घर घर तुम्हारी जरूरतें पहुंचा दूंगा, हींग लगे नाम फटखड़ी रंग
- 40:19भी चोक खा दे लेकिन मैं तुमसे कहता हूँ मैं तुमसे हींग फटखड़ी
- 40:28कुछ नहीं मांगता। यहाँ तुम्हें बैठने को स्थान
- 40:36मिलेगा, बस अंगूठा लगाओ और चले जाओ इसमें मेरा कोई लोग नहीं है,
- 40:41कोई नहीं तो स्वार्थ नहीं है। बस तुम मुक्त हुए फिर मैं जानू,
- 40:50मेरा काम जानू, मैं तुम्हें ले आऊंगा।
- 40:52मार्ग। यह है मेरी ही सरदर्द तुम्हारा
- 40:58खुश नहीं और अगर प्रवचन सुनने हो तर्क सुनने हो बुद्ध की काँट शर्ट
- 41:08सुनने हो तो चले जाओ आइचार्य के। पास।
- 41:12और तुम्हारी सटिस्फैक्शन कर देगा खोपड़े की मैं सटिस्फैक्शन करूँगा
- 41:20तुम्हारे दुःखलों की अहम् तुम सर्व पाप्य भवमुख्य श्यामी माँ
- 41:27सुचा मैं तुम्हें पापों से मुक्त करके सटिसफाई कर।
- 41:31दूंगा। और वो तुम्हारे शब्दों को तर्कों
- 41:35से काटकर तुम्हें सटिस्फाई कर देंगे।
- 41:37बस यही है असली और नकली का फर्क। मैं उस फूल से बात करता हूँ जो
- 41:45धरती का गर्भ पाड के बाहर निकलता है उसमें।
- 41:50सुगंध अति धरती के बीच वंश और ये आचार्य लोग जो सुगंध देते हैं वो
- 41:57फैक्टरी का बना हुआ माल होता है। सुगंध ऊपर से छिड़कनी पड़ती है
- 42:02इसलिए तो इतनी ऐड लगाने की आवश्यकता पड़ती है।
- 42:07मेरी तो वाणी ही मेरी ऐड है। है और वही सुनेगा जिसके ऊपर उसकी
- 42:17कृपा है। बाबा नानक ने मूल मंत्र में सबसे
- 42:23आखिरी में काका गुरु प्रसाद। सच्चा साहब ये नजर करें तकाबो हंस
- 42:33कराएं उसकी रहमत जीस पर हो जाएगी। जीस सदन हो जाएगी मैं मैं क्यों
- 42:44ऐड करूँ नीत स्वार्थ। जो रखता है वह करी ऐड देखने वालों
- 42:53ने देखा है दुआ तुम इस धुएं को ऐश कहते हो पुत्र किसने देखा दिल
- 43:02मेरा, चलता हुआ आह। एक बार की उससे जलती हुई आंख को
- 43:09देख लो तो तुम निहाल हो। जाओगे?
- 43:17आठ में तुम हो जाओगे बाबा कहते साथ हैं अभी जो एश ले रहे हैं और
- 43:24हम बाहर नहीं निकलते हैं। इसीलिए नहीं है क्या मैं कोई मार
- 43:28जाएगा दरवाजे खुले हैं। आ जाओ, भाई।
- 43:34हम किसी की तलाशी नहीं लेते हैं। पूछ लेना, जीतने लोग आए कभी किसी
- 43:39के, मैं तो नाम भी नहीं पूछता कहाँ से आए ये भी नहीं पूछता।
- 43:45लोग तो अर्क निकाल लेते हैं। उनका मंतव्य कुछ नहीं तो स्वार्थ
- 43:50कुछ हो रहा। है।
- 43:54वो तो सर रगड़ा चढ़ा देते हैं कहाँ से आए कौन हो?
- 44:08उनका मतलब यह होता है पूछने का कि तुमसे मैं काम क्या ले सकता हूँ?
- 44:15बस यही मतलब होता है मेरी बात तो उससे समझ लेना।
- 44:20अगर तुम्हें कोई ज्यादा। रगड़ा चढ़ाना शुरू कर दे ना कहाँ
- 44:26से आए हो तुम्हारा नाम क्या है सिफारिशें तुम्हारी तहकीकात करनी
- 44:33शुरू कर दे संबंध बनाने शुरू कर दे हाँ तुम मेरी मासी के ताऊ के
- 44:42पोते के साले हो। इन राजनीतिकों का सब जगह से संबंध
- 44:48हुआ करता है पुराना पता नहीं कितने के जन्मों के ये फिर रहे
- 44:53हैं। यहाँ पर सभी जगह से संबंध हैं।
- 44:58और वो भी पुराना। देखिए ये मेरा ढंग है समझाने का,
- 45:08मैं भी क्या करूँ? सीधे शब्दों शास्त्रों में बहुत
- 45:13लिखे हैं। आप कहाँ समझ रहे हैं उपनिषद भरे
- 45:17पड़े हैं सच्चे क्या? लेकिन आप कहाँ समझते हो?
- 45:22ये मेरे समझाने का अनोखा तरीका है और सही तरीका है तुम ऐसे ही
- 45:28समझोगे, देखने वालों ने देखा है दुआ तुम इस धुएं को ऐश करते हो?
- 45:45पर यह धुआँ कैसे काम का नहीं होता?
- 45:48आँख में पड़ जाए कुछ देर के लिए आँखें देखना बंद कर देंगे न
- 45:57सपोटों में घुस जाए तो सासना बंद हो जाता है।
- 46:02धुआँ कोई अच्छा काम नहीं करता। आग पे खाना पका लो आग पे सब्जी
- 46:08बना लो आग पे चाय दूध बना लो मन पसंद मन भावन व्यंजन तैयार कर लो।
- 46:16आग बड़ा काम आती। है।
- 46:19धुआं किसी काम नहीं आता और तुम उसको ऐश कहते हो?
- 46:24हम्म। क्या ये ऐश तुम इस सिद्धू में को
- 46:34देखकर कहते हो ऐश दिन बंधु ये बताओ?
- 46:47यह शराब पीने वाले बेचारे दया के पात्र हैं।
- 46:59इन पर दया। करो।
- 47:05वे चारो को शराब क्यों नहीं पड़ती?
- 47:10गम भलाने के लिए शराब क्यों नहीं पड़ती है इसको तुम?
- 47:15ऐश कहते हो, मैं मेडिकल में पढ़ा करता था, मेरे भाई ने शराब की एक
- 47:24बोतल के भीतर। एक हड्डी डालती और एक मांस का
- 47:28टुकड़ा टालती। 10 दिनों के बाद हमने उसे देखा
- 47:32सारी हड्डी गली पड़ी थी, छन्नी पड़ी थी।
- 47:34उसके भीतर सुराग हुए पड़े थे। और।
- 47:38मांस मांस का तो पता ही नहीं चल रहा था खोरी।
- 47:43हड्डी के भीतर हड्डी कितनी सख्त होती है?
- 47:48हड्डी के भीतर सुराख निकले हुए मेरा भाई मुझे कहने लगा देखो शराब
- 47:57के ये फायदे हैं। मैं भी हँसा।
- 48:03मैंने कहा समझाने का तरीका बड़ा शानदार है और खुद जो शराब पीता था
- 48:19भला जो शराब पीता है वह दया का पत्र है यह वह ऐश कर रहा है ज़रा
- 48:28सोच के बताना मुझे। सत्य मैंने बता दिया है तर्क नहीं
- 48:35कर रहा हूँ सत्य बता रहा हूँ बना जीसको दो घड़ी नींद लेने के लिए
- 48:43अपनी इतनी ऊर्जा जो शरीर इतनी मेहनत करके।
- 48:52रस, रक्त, मेद, मज्जा, हड्डी, मांस, वीर्य का खून वीर्य का
- 49:00उत्पत्ति करता है। उसको तुम पल भर के आनंद के लिए।
- 49:08गवाह देते हो और तुम इसे शबाब का मजाक कहते हो।
- 49:21तुम्हें कभी अक्ल आएगी, कभी परमात्मा ऐसा दिन लेके आएगा एक
- 49:31तुम भी सुखी हो जाओ। मृग तृष्णा को तुमने दूर से देखे
- 49:38हुए चमकते हुए रेत के ऊपर अभ्रक और रेत की रिफ्लेक्शन जो जा रही
- 49:48है आसमान में उसको तुम कहते हो। वहाँ तो पानी का सर्वर है तो मृग
- 50:01तृष्णा में उलझा हो गया। शरीर ने जितनी मेहनत करके कितनी
- 50:08मेहनत करता है, शरीर बचा 1 मिनट में 72 बार धड़कता है।
- 50:17कितनी मेहनत करता है शरीर वो है बेचारा मेहनत करके महीने भर में
- 50:24जो चीज़ पैदा करता है, तुम शबाब के जरिए उसे बहला देते हो, इसे
- 50:34तुम मज़ा कहते हो, इसे तुम ऐश कहते हो।
- 50:41ज़रा सोचो एक पल के सुख के लिए शरीर की इतनी मेहनत तुमने पल भर
- 50:49में बेकार कर दी। तो उसका क्या होगा?
- 50:58जो कहता जिन्हें नसे जहान दे उतर जान प्रभात।
- 51:03नाम हमारी नान का जुड़ी रहती है दिन।
- 51:05रात ऐसी कौन सी खुमारी कौन सी खुमारी है ऐसी जो दिन भर रात छड़ी
- 51:13रहती है और बिना भी है यहाँ पर लोग आ जाते हैं बाबा शराब छुड़वाओ
- 51:21किस तरह से? छूटती नहीं है।
- 51:26का फिर मुँह को लगी होय, मैंने कहा।
- 51:30पुत्र और कोई तरीका नहीं है। मुझे देख लिया कर मैं रोटी भी
- 51:36नहीं खाता, तुम शराब की बात करते हो और जिंदा हूँ और मस्त हूँ।
- 51:43जिंदा हूँ और मस्त हूँ और आनंद में हूँ और बाट रहा हूँ मेरी तरफ
- 51:50के देख लिया करो, तुम कहते हो छूटती नहीं है काफी मुँह को लगी
- 51:58हुई है। मैं कहता हूँ मैं इतनी पीता हूँ,
- 52:05इतनी पीता हूँ तुम्हें दिखती नहीं जो मैं पीता हूँ, कोई बाहर उसका
- 52:11ताम झाम नहीं है, कोई टेबल नहीं है, कोई बैग नहीं है, कोई भुजिया
- 52:16बादाम पकौड़ा नहीं रखा है। कोई चटनी लाल पीली हरी नहीं यह तो
- 52:24कृपा भीतर से आती है मत रसो भाई वो चला गया ऐसा पैसा कमाया कभी
- 52:36कमाया करता है। पगले हुए पैसे के बिना आनंद आया
- 52:44करता है यह मस्ती वो जड़ी बेलपेटियां चढ़ जावे कोई ठेके के
- 52:52ऊपर शराब का पैसा नहीं खर्च करना पड़ता।
- 52:59यह मज़ा यह मज़ा तो राम जानते हैं कि मैं ही हूँ जिसने जान लिया कि
- 53:09मैं ही हूँ मज़ा। फिर वह मज़ा लेने वाली इंद्रियों
- 53:14को छोड़ भी दे तो उसके लिए कोई मुश्किलात नहीं है।
- 53:26तुम संतों की बातों को सुनकर किंग कर्तव्य विमूढ़ हो जाते।
- 53:30हो क्या करें? ये बोल क्या रहा है?
- 53:35ये कहाँ से बोल रहा है? उसकी आवाज में मंसरी किसी मजरता
- 53:40है। इसकी आवाज में खनक है।
- 53:45इसकी आवाज में मदहोसी का वो आलम है जैसे सारे जहान ने शराब बोली
- 53:50हो। और नशे में झूम रहा हो।
- 53:57ये हैक क्या पे लिया है इसमें और उसके पास कोई बैग, शेक भी नहीं
- 54:02लगता, कोई टेबल वगैरह भी। मैं तुम्हें वही पिलाना चाहता हूँ
- 54:17वो है असली ऐश काश तुम फैक्टरी में बने हुए इन फूलों को पहचान
- 54:27लो, इसे ही जागना कहते हैं वी अवेयर।
- 54:33जा जाओ और देख लो। ये फूल फैक्टरी के बने हुए हैं।
- 54:38ये फूल वो नहीं जो असली धरती का गर्भ पहाड़ के बाहर आए।
- 54:47और जिनके। आत्मा से निकली हुई सुगंध
- 54:51तुम्हारी नासा फूटों को ही नहीं, तुम्हारे शरीर के रोए रोए को
- 54:56ताजगी बक्श देती हैं। संत कहते हैं बी अव्वल जागो जागकर
- 55:15देखो, ऐश क्या है? तुम इस धुएं के बिलकुल नीचे आग
- 55:21पाओगे, इस शब्द को फिर सुन लो और इस शब्द को अपना मोठों की तरह लिख
- 55:27लेना दीवार पर लिख लो जब तुम गृह प्रवेश करो द्वार के ऊपर यही लिखा
- 55:34पाओ। इस धुएं के नीचे देखो क्या अभी तो
- 55:42तुम और और सी बातें करते हो चोली के पीछे क्या क्या है, माटी है और
- 55:47क्या? आज नहीं कल माटी हो जाये।
- 55:53मैं कहता हूँ धुएं के नीचे क्या है देखो।
- 56:05आग है आग, वही आग जो तुम्हारे सभी विचारों को मिटा देते हैं, जो
- 56:14तुम्हारे सभी विचारों को मिटा देते हैं, जो तुम्हारे सभी इकट्ठी
- 56:19की हुई। शब्दावली सूचनाएं विश्व को जला
- 56:33देती है रह आग। वह आग में देखने वालों ने देखा है
- 56:47धुआं। दिन बंधु पुत्र तुम चुप कर के तुम
- 56:54मनदेव इसलिए ऋषि फ़रियाद करता है भगवान से तुम सो।
- 57:01इस अंधकार से धुआं काला होता है। पुत्र और अंधे को भी रोशनाई नजर
- 57:11नहीं आती। ऋषि के शब्दों में तुम उलझ जाते
- 57:17हो। शब्दों के रहस्य में तुम नहीं
- 57:20जाते। ऋषि कहता है इस अंधकार से मुझे
- 57:24ऊपर उठाओ। हे प्रभु हे सृजन वारे हे सृष्टि
- 57:30करता हे सर्व जगत के नियंता सृजन करने वाले।
- 57:36और पालन करने वाले, संहार करने वाले हे महाप्रभु मुझे आँखें दो।
- 57:46जो तेर गमे आँखों से ही दिखता है प्रकाश और ध्यान रखना आँखों से ही
- 57:52दिखता है धुंआ ऋषि आंख मांगता है। ऋषि कहते हैं मुझे आँख देते हैं
- 58:04अभी तो तुम इस धुएं को ही आँख समझ रहे हो जो काला।
- 58:10धंधा करते हुए ऐसे। करते हैं।
- 58:14काश तुमने कंपैरिजन किया हो। काश तुमने संत का जीना, उठना,
- 58:24बैठना, बोलना, चलना उसके भीतर से उमगती हुई वो करने एक अपल के लिए
- 58:32भी तुमने निहार ली होती। तो तुम भूल जाते, ऐश होती क्या
- 58:39है? ऐश तो वह है जिसमें संत बैठा होता
- 58:42है। तुम जीस शराब को पीते हो, उस शराब
- 58:49को पीकर तुम खंडित हो जाते हो। तुम कहती हो जैसे ऐश।
- 58:56उस शराब को भी क्या तुम विखंडित हो जाते हो, भ्रमित हो जाते हो इन
- 59:01हैलो स्नेशन? स्वच्छता हूँ अपने घर को देख कर।
- 59:20सोचता हूँ अपने घर को देख कर हो ना हो हो ना हो ये है मेरा।
- 59:34देखा हुआ हो न हो ये है मेरा देखा हुआ कल चमन था।
- 59:54तुम भूल भुल जाते हो इसलिए प्रकृति ने तुम्हारे लिए
- 59:58इंताजामात किया कि तुम फिर फिर से याद कर लो अंतरंग क्षणों के जरिए
- 1:00:07याद कर लो शराब की मदहोशी के जरिए याद कर लो याद कर लो।
- 1:00:17अगर उसकी याद आ जाए। वही तो शमण है तुम्हारी रेपुटेशन
- 1:00:23तुमने हर चीजों को बिगाड़ तिगाड़ दिया है कोई क्या करे तुम?
- 1:00:32इतने भ्रम की स्थिति में हो के अपने ही घर को देखकर कहते हो यह
- 1:00:38आनंद मेरा जाना पहचाना है कुछ जाने पह जाने से लगते हैं जाना
- 1:00:48सोचता। हूँ।
- 1:00:50अपने घर को देखकर सोचता हूँ अपने घर को देख कर हो न हो।
- 1:01:07हो न हो ये है मेरा देखा हुआ कल चमन आज नहीं कल विज्ञान ईश्वर
- 1:01:21करे, वह उन्नति करे और उस मुकाम पे पहुंचे।
- 1:01:25कि तुम बार बार संभोग के उन क्षणों में जाने के लिए उत्सुक
- 1:01:30क्यों होते हो? तुम बार बार उन अंतरंग क्षणों में
- 1:01:37जाने के लिए लालायित क्यों रहते हो?
- 1:01:41आज तुम्हें कारण बता दूंगी। हो न हो ये है मेरा देखा हुआ।
- 1:01:50उस पल में, तुम दूर से दूर दराड़े उसकी एक किरण देख लेते।
- 1:02:01और वह तुम्हें लुभा जाती है। तुम्हें पुरानी माशूका की तरह
- 1:02:05उसकी याद आती है, ओह, यह तो मेरा देखा हुआ है और वह तुम ही हो, तुम
- 1:02:15बोल गए हो, इसलिए संत कहते हैं, रीमेम्बर यूरसेल्फ़।
- 1:02:20याद करो तो प्रकृति इंतज़ामात कर देती है तुम्हें याद कराने की एक
- 1:02:27छोटी सी व्यवस्था एक सुराख रख लिया है उसने कि तुम इस बहाने से
- 1:02:34याद कर लो। लेकिन याद ही करते मत रहो, ये
- 1:02:41समझो तुम याद ही करते रहते हो। तो मात्र दूर से सरोवर को देख कर
- 1:02:53ही निहारा हो जाता। कभी उसके बीच में जाके अठखेलियां
- 1:02:59खाने का तुम्हारा मन ही नहीं होता।
- 1:03:03तुम कहते हो ये तो असंभव है बस राधे राधे करते रहो अरे उल्लू के
- 1:03:08पट्ठे तेरे चेहरे पे नूर नजर नहीं आता तेरी आवाज में।
- 1:03:15सौगंध नजर नहीं आती। क्यों?
- 1:03:20बाप का बाघी बन रहा। है।
- 1:03:24देखने वालों ने देखा है धुन किसने देखा दिल मेरा, चलता होगा मेरा हर
- 1:03:34शब्द। इस प्रयास से युक्त होता है कि
- 1:03:37तुम किसी ना किसी तरह उससे जलती हुई आदमी चले जाओ, धुएं के
- 1:03:43बिल्कुल नीचे मिलेंगे। अरे बात मैंने पहले ही बता दी।
- 1:03:49जब राहगीर भटक जाते थे तो धुंआ जलता था, वो कहता।
- 1:03:54हाँ। यहाँ धुआँ जल रहा है, आग भी हो
- 1:03:57गया और शांति प्रजाति ठडक हो जाती, गड़बड़ाई हृदय ठहर जाते और
- 1:04:09वहाँ कोई आदमी बैठा हुआ मिल जाता। कोई संत स्वादिष्ट हुआ मिला बैठ
- 1:04:16जाता हूँ, इस धुएं को मत निहारो ये तुम कालिख को देख रहे हो, इस
- 1:04:33कालिख को तुम ऐश समझ रहे हो? मैं तुम्हें कहता हूँ ये कहाँ से
- 1:04:39आ रही है इसका उदगम शटल खोजो जिनको अन्नदनद शुरू हो गया है वो
- 1:04:51अन्नदनद का धागा पकड़ के। उसका उदगम सतल उसका उदगम स्रोत
- 1:04:57कोयले वहीं से आती है। ये आवाज़ गुंगुरू इस सूत्र को
- 1:05:09पकड़ लेना, इसको सुनना परमात्मा ने तुम्हें पुकार लगाई है।
- 1:05:18यह अन्नथनाथ इतना मीठा क्यों है? इतना प्यारा, इतना स्वादिष्ट,
- 1:05:25इतना मीठा से भरा हुआ? इस धागे को पकड़ लो और इसके सहारे
- 1:05:33इसके उदगम स्रोत पे चले जाओ। बस तुम पाओगे।
- 1:05:39मिल गई आग भगवान कृष्ण कहते हैं इसको आग जला नहीं से आग को आग का
- 1:05:49खाक जलाएगा आग। को तीर क्या काटेगा तलवार क्या
- 1:05:56काटेगा तुम आग को तलवार। से काट के दिखा दो, यह एक
- 1:06:08सिम्बोलिक रीप्रेसेंटेशन समझाने के लिए शब्द।
- 1:06:12है क्या काटेगी? तलवार से नहीं तलवार काट सकती
- 1:06:21आपको? नहीं आग आग को काट सकती है तुमने
- 1:06:30देखा हवा हवा आग को बजा नहीं सकती हवा आग को प्रज्वलित कर सकती है
- 1:06:37कहाँ एक दुकान जल रही है, कहाँ सारी मार्केट जल जाती है?
- 1:06:46हाथ को कोन बजायेगा हाथ को बजायेगा पानी तुम पानी बन जाओ।
- 1:07:05तो ये आग बुझेगी आग विषय वासना की कहता हूँ उस साख की बात नहीं करता
- 1:07:12वह आग तो तुम हो वो तो कभी बुझता नहीं उसका तो।
- 1:07:17मूल स्वभाव ही है न जलता, न कटता, न मरता न सूखता।
- 1:07:24ना गीला होता, ना बाहर आती, ना तूफ़ान आता ना शस्त्र काटता, ना
- 1:07:32जलाता निकिल में वासनों की आँख को भिजान करें पानी, काम आता है
- 1:07:42पानी। तुम कहते हो काला धंधा करने वाला
- 1:07:53ऐसे गुजारता है तुम गलती खा गए बेटे तुमने धुआँ देख लिया मैं
- 1:08:07कहता हूँ धुएं के संग। धुएं की धागे को पकड़ के सूत्र को
- 1:08:13पकड़ के उसके उदगम स्रोत में उतर जाओ।
- 1:08:18इस धुएं को सहारा बना लो जैसे राहगीर लोग उस धुएं को सहारा
- 1:08:24बनाकर वहाँ पहुँच जाते थे। जहाँ कोई संत समाधि सतल पर लगाए
- 1:08:29बैठा है धुरी पर बैठा है संत मस्तिष्क।
- 1:08:41तो राहगीर देखता है कि धुआँ है तो आगरी हो गए।
- 1:08:49तुम सदा ही धुआं से प्रभावित होते रहे हो, ये धुआं तो दिखावा है, छः
- 1:08:58बार कपड़े पहन लो, बदल लो साड़ियाँ बदल लो, आठ बार बहुत सा
- 1:09:04अमीर हूँ मैं। क्या खाक?
- 1:09:11सुंदर दिखने के लिए अगर फेस पाउडर का इस्तेमाल करना पड़े उम्र का
- 1:09:18तकाजा ऐसा कि वृद्ध होने के बाद तुम्हें फेस पाउडर की जरूरत पड़ती
- 1:09:23है। लेकिन मैं ऐसा तत्व जो कभी व्रत
- 1:09:28नहीं होता, मैं ऐसा तत्व जो जलता गलता, मरता सूखता तो नहीं, मेरी
- 1:09:38गलोब भी कभी नहीं गड़ते मैं भूटान नहीं होता।
- 1:09:45अजहर अमर बुढ़ापा मुझे छू नहीं सकता, फिर यौवना फिर यौवन मेरा
- 1:09:55स्वभाव, मुझे किसी फेस की आवश्यकता नहीं पड़ती, मैं स्वभाव
- 1:10:01से ही। ला भन्य से युक्त मैं वो चमक हूँ
- 1:10:10जो कभी फीकी नहीं पड़ती। मैं भूग रो हूँ, जो उम्र के
- 1:10:16तकाज़े से डलती नहीं और तुम कहते हो कबाब।
- 1:10:28मैं कहता हूँ तुम दया के पात्र हो, तुम ऐसी दयनीय स्थिति में आ
- 1:10:36चूके हो? क्योंकि तुम्हारे भीतर करुणा बची
- 1:10:41है और करुणा ही वो आनंद। है।
- 1:10:48जीसको मैं आप कहता हूँ जब तुम्हारे भीतर या किसी के भीतर
- 1:10:55करुणा नहीं बचती वह मेमना काटता है और उसे धार्मिक नाम दे देता है
- 1:11:06मेमना मासूम। उस जैसा मासूम नहीं होता तो उसकी
- 1:11:12बलि दे देता है। कच्चा कच्चा में मनाओ और कहता
- 1:11:17बकरीद मनाली तुम त्योहारों के नाम पर अपने स्वादों की पूर्ति करते
- 1:11:25हो। कोई भैंसा काट लेता है, कोई घोड़ा
- 1:11:30काट लेता है, किसी जमाने में नर बली भी थी, आदमी को काटा जाता था
- 1:11:38समाज कुछ प्रबुद्ध हुआ है, अपने स्वाद के लिए तुम सब करते हो।
- 1:11:46और ज़रा भी फिक्र नहीं करते और फिर अगर फिक्र नहीं करते पुत्र तो
- 1:11:54फिर दुखी तो तुम्हें होना ही पड़ेगा, क्योंकि उसके घर देर भी
- 1:11:58तो नहीं अँधेर तो छोड़ ही दो। तुम कहते हो कर्मों का फल पियो
- 1:12:08शराब शराब पीते ही चड़नी शुरू हो जाती।
- 1:12:12है। कहाँ देर लगी?
- 1:12:18सिर्फ देर लगती है तुम्हारी बाड़ी कर्मों में।
- 1:12:22वो देर सिर्फ प्रोसेशन की होती है बीज से वट वृक्ष बनने में लेकिन
- 1:12:27तुम्हें नहीं पता कि पाप में बढ़ते जाते हैं।
- 1:12:29रोज़ व्याज की तरह दिनभर रात बारिश आए, अँधेरी आए, ओले पड़े,
- 1:12:39तूफ़ान आए जैसे व्याज बढ़ता है। वैसे ही तुम्हारे किए हुए कर्मों
- 1:12:44के फल दुष्ट कर्मों के फल बढ़ते हैं।
- 1:12:49इसलिए तो इतना बड़ा वट वृक्ष हो जाता है, एक छोटा सा बीज, छोटा सा
- 1:12:59बीज और तुम हैरान होगे। केस के प्रति ब्लूप्रिंट छिपा है
- 1:13:06इतने बड़े वाट वृक्ष का। हाँ।
- 1:13:09यही तो कमाल है उस कुशल कारीगर का।
- 1:13:15उस कुशल कारीगर की यही तो कुशलता है।
- 1:13:21तुम्हारे छोटे से वीरे के परम के भीतर जो दिखता भी नहीं दूरबीन से
- 1:13:28दिखेगा माइक्रोस्कोप से दिखेगा उसके भीतर तुम्हारी पूरे जीवन का
- 1:13:34ब्लूप्रिंट। छिपा है।
- 1:13:38तुम क्या खाक उसकी बराबरी करोगे? व्यर्थ का अहंकार है, व्यक्ति जो
- 1:13:49कर रहा है अहंकार आज नहीं कल ढल जाएगा।
- 1:13:58तुम। सोचते हो सदा जिंदा रहेगा, लेकिन
- 1:14:01सदा जिंदा कौन रहा है? तुम्हारे विवाह दा दे, पड़ दा दे
- 1:14:07सर दा दे उससे आगे उनमें से कोई है, अभी बताओ मुझे तुम भी नहीं
- 1:14:15रहोगे 1 दिन तुम भी अब्सेंट हो जाओगे।
- 1:14:23आवाज़ लगेंगी और तुम कहीं नहीं मिलोगे तुम किसी और रूप में कहीं
- 1:14:29और मिलोगे? वह व्यक्ति जिसने अपनी करुणा खोदी
- 1:14:35है, तुम उसको अय्याश कहते हो? ऐश कहती हूँ जिसने अपनी करुणा खो
- 1:14:45दी वह तो दया का पत्र हो। गया, जो करुणा से भर गया।
- 1:14:57जैसे जैसे अब इस बात को ध्यान से सुनें जैसे जैसे तुम्हारी चेतना
- 1:15:04बढ़ेगी। तुम जागोगे जिसे मैंने अवेयर कहा
- 1:15:09जिसे मैंने रिमेम्बर। कहा।
- 1:15:13रिमेम्ब्रेंस बढ़ेगी, अवेयरनेस बढ़ेगी, वैसे वैसे करुणा भी
- 1:15:17बढ़ेगी। और करुणा जब।
- 1:15:21परिपूर्ण हो जाएगी तो तुम्हें ड्रामेबाजी नहीं करनी पड़ेगी।
- 1:15:27जैनमनी की तरह। अब जैन मनी 84 में बाहर नहीं
- 1:15:33निकलते क्योंकि बिलों के अंदर पानी घुस जाता है और कीड़े मकोड़े
- 1:15:40अपने बिलों से बाहर आ जाते हैं। नहीं तो मर जाएंगे।
- 1:15:42पानी घुस जाता है उनके बिलों में तो जैन मनी।
- 1:15:48बाहर ही नहीं निकलता। चोमा से मुझे बहुत से लोग पूछ
- 1:16:00लेते हैं। इसका जवाब मैं फिर कभी दूंगा।
- 1:16:05बड़ा शानदार जवाब मुझे पूछ लेते हैं बाबा फिर जैन मुनि किसी बस
- 1:16:13कार में बैठ जाया करें। फिर तो उनके पांव के लिए कुछ नहीं
- 1:16:17ना आएगा। मैंने कहूं फिर जीस बस कार में
- 1:16:21बैठे उसके टायर के तरह आएगा, फिर टायर उसके पांव हो।
- 1:16:25गए। तो चक्कर में खा जाता है वो।
- 1:16:32बड़ा गहरा सवाल है फिर दोष किसका? फिर तो कार लेलो, फिर तो बसों के
- 1:16:37मालिक बन जाओ, बसें चलाओ, खूब पैसा कमाओ फिर पाप तो बस को
- 1:16:48लगेगा, लग जाएगा हमें क्या है? हम तो जैन मुनि हैं, हम तो आराम
- 1:16:57से कार में बैठो, कार के टायर के नीचे जो चीज़ आएगी उसका दोस्त
- 1:17:02नंबर। लगो जैन मुनि घबराए जाते हैं।
- 1:17:07इन बातों से कितने अच्छा? फिर तो टायर तो देखता ही नहीं है।
- 1:17:13हम तो थोड़ा देख के तो खेलेंगे ऐसे ऐसे पागलपन तुमने बखैर रखे
- 1:17:19हैं, इसका हल्का है। प्रश्न बड़ा लाजवाब है, लेकिन
- 1:17:26इसका जवाब मेरे पास है। लम्बा चूड़ा प्रसन्न है और वीडियो
- 1:17:32आज की बड़ी लम्बी पहेली हो चुकी है।
- 1:17:34कभी प्रश्न करते न मुझे याद करा दो तो मैं तुम्हें बताऊँगा कि जैन
- 1:17:41मुनि पैदल चलता है तो बचा सकता है बहुत से कीड़े मुकड़ों को लेकिन
- 1:17:45कार्य और वस्त्र कहीं देखते नहीं। उसे कीड़ा मकोड़ा कहाँ नजर आता
- 1:17:49है, उसका बंदा भी नजर नहीं आता। आदमी को पिछड़ा के चली जाती है।
- 1:18:001000 टन खुद का ही वजन होता है, उसका कौन बचेगा?
- 1:18:09और ऊपर से लोडेड? और उसके ऊपर सवारियां बैठी जैन
- 1:18:17मुनि अच्छे खाते पीते करा लेंगे। इनके गोगड़े देखो।
- 1:18:31जिनको वजन घटाना चाहिए वो ख्याल नहीं करते।
- 1:18:36संसारिक लोगों को विचारों को कितने उपत्र होते हैं?
- 1:18:39हाउ टू लूज़ बैठ ये दवा खा लो वो दवा खा लो या मज़े से बैठो देन
- 1:18:47दुमनी। रात चौकड़ी बढ़ते ही रहती है
- 1:18:50ब्याज की तरह और देखो इनके गोखड़े कितने फैले हुए है एक हमारे मुनि
- 1:18:58हुआ करते थे शंकराचार्य, उनका नाम मैं भूल गया, बस नाम ही तो भूल
- 1:19:04जाता। हूँ।
- 1:19:10देखने वालों ने देखा है धुआँ देखने वालों ने देखा है धुआँ।
- 1:19:29किसने देखा दिल मेरा जलता हुआ कल चमन था, आज एक सेहरा हुआ देखते
- 1:19:49ही। देखते ये क्या हुआ कल चमन याद
- 1:19:57रखो। इस धुएं के नीचे है वो तत्व शराब
- 1:20:09पीना तुम एसी कहते हो कितने दिनहीन हो गए?
- 1:20:17और फिर जो शराब छोड़ने की बात करता है उसे मैं कहता हूँ मुझे
- 1:20:20याद कर लेना कोई शट है, तो 510 दिन मेरे द्वार पर बैठ।
- 1:20:27जाओ। देखो कोई खाना ले के आता है क्या?
- 1:20:32बा मुश्किल मुझे याद कराना पड़ता है कि आज चाय आपने एक बार भी नहीं
- 1:20:37पी और वक्त हो गया। शाम के चार तो 1015 दिन यहाँ
- 1:20:46बैठने वाले बैठते भी हैं, आते भी हैं, बैठते भी हैं और जानते भी
- 1:20:49हैं। ये शक्ति कहाँ से आती है?
- 1:20:56ये शक्ति उसी आग से आती है जो मैं हूँ।
- 1:21:01ये शक्ति उसी आग से आती है जो मैं हूँ।
- 1:21:08मैं चैतन्य स्वरूप शक्ति स्वरूप सत्य चित आनंद वहीं से आता है।
- 1:21:16आनंद वहीं से आती है शक्ति तुम्हारी रोटियां थोड़ी शक्ति
- 1:21:20देती हैं मुझे नहीं देती थी शक्ति इसलिए मैंने छोड़ दिया।
- 1:21:27क्यों व्रत का वो जड़ो ना जब शक्ति ही वहाँ से आए बस थोड़ा
- 1:21:33हार्ट बीट करने के लिए चाय चलती है बस यह जो बोलने की शक्ति है यह
- 1:21:41जो आवाज़ के साथ पुकार और मेटास और।
- 1:21:45गुंजार आता है, ध्वनि आती है वीणा किसी ये तो मुझसे आ रही?
- 1:21:52है। मैं ही मज़ाम और राम को ये पता लग
- 1:21:58गया कि मैं ही मज़ाम कृष्ण को ये पता लग गया कि मैं ही मज़ाम।
- 1:22:03तुम भी खोजलो तुम भी मज़ा अन्यथा झटके झटके मारने खाने पड़ेंगे फिर
- 1:22:13मज़ा आएगा और कब तक झटके मारते खाते रहोगे?
- 1:22:23जब भी कोई मज़ा है प्रकृति याद कराती है, तो मैं सिर्फ मात्र याद
- 1:22:29करो, दूर से देखा हुआ वह तो फिर उसके पास चले जाओ।
- 1:22:35दूर रह कर ना करो। करी बाजा एक मुद्दत से तमन्ना ही
- 1:23:15तुम्हें छूने की। एक मुद्दत से तमन्ना थी तुम्हें
- 1:23:29छूने। की यह जो तुम दूर से झलक देखते
- 1:23:38हो? तो तुम्हारी भीतर तमन्ना उत्तमन
- 1:23:43होती है कि यह बार बार दिखता रहे। कितना प्यारा है यह यह एक झरोखा
- 1:23:51था। और।
- 1:23:54परमात्मा ने प्रकृति के जरिए तुम्हें एक झरोखा दिया।
- 1:23:58कि ज़रा इसे झरोखे में से झांक के देखो और तुमने तुमने तो तुम तो
- 1:24:05इसके साथ नीचे फट गए तुम तो इसके कारण व्यवचार क्या करते हो कतल
- 1:24:14गारत कर देते हो? ये तुम्हारी गद्दी पर बैठे हुए
- 1:24:18व्यक्ति इसी चीज़ के दोषी पाए गए। आज बस।
- 1:24:27में नहीं जज़्बात करि बाजा। कर ना करो बात करिवा जाओ।
- 1:24:50शराब हो, शबाब हो या कबाब, अब कबाब तो वह व्यक्ति खायेगा।
- 1:24:59अगर किसी मैमने को काटकर भी तुम्हारी आत्मा ने चेतकार नहीं
- 1:25:03किया तो समझो तुमने अनंत से अपना संबंध विच्छेद कर दिया है।
- 1:25:11जैसे तुम अपना कोई अंग काटकर गहरा दो।
- 1:25:20अपना। अंग काट के अगर बाहर करा दोगे तो
- 1:25:23उस अंग के साथ तुम्हारा संबंध स्थापित नहीं हो सकता, फिर उस अंग
- 1:25:30को कोई काटे जाए, पीटे जाए, खाये जाए, उबालें जाएं, नमक, मिर्च या
- 1:25:36मसाले से तड़के जाएं। तुम्हें कुछ नहीं पता लगेगा।
- 1:25:41अगर तुम किसी प्राणी को काटते वक्त तुम्हारी आत्मा को लाते नहीं
- 1:25:45तो समझना तुमने उस अनंत के साथ अपना संबंध तोड़ लिया है।
- 1:25:52बस यही है बात और कुछ बात। तुम कितने दिन हीन होगे कि तुम
- 1:26:09जीवंत चीजों को मारकर अपने स्वाद के लिए त्यौहार बनाते हो।
- 1:26:13बकरीद। सोचो मैंने तुम्हें निचोड़ बता
- 1:26:22दिया। अगर यहाँ तक नौबत आ गई के सब होते
- 1:26:31हुए भी तुम्हें मेमने को मार के खाना पड़ता है तो समझो
- 1:26:37संवेदनशीलता खत्म हो गई नेउरोन सब टूट गए।
- 1:26:42वो झटक दिया शरीर का अंग तुमने काट कर फेंक दिया तुम अनंत से अलग
- 1:26:49हो गए अनंत से अलगाव जैसे हमारे शरीर का कोई।
- 1:26:54अंग हमारे पूरे शरीर से अलग हो जाए फिर उसके ऊपर क्या गुजरेगी
- 1:27:00हमें नहीं पता चलेगा। और जब तक तुम शरीर के संग उसके
- 1:27:09पार्ट की तरह रहोगे तो एक कांटा भी चुभेगा ऊँगली में तो तुम्हारे
- 1:27:16नेरोन्स को पता चलेगा कि कांटा चोभा है।
- 1:27:21इस विशाल अनंत के साथ तुम्हारा जुड़ाव है।
- 1:27:25मैं बहुत बार बोल चुका हूँ यह एक दागे के अंदर बोता हुआ जाल जिसे
- 1:27:32तुम संसार कहते हो ब्राह्मण कहते हो अगर इसका अंग टूट जाए कोई।
- 1:27:39तो उससे संबंध टूट गया। हमारा इसलिए तुम आज दुखी हो तुमने
- 1:27:49परमात्मा से अलगाव। कर लिया तुम्हारा ये शरीर का अंग
- 1:27:56तुम। परमात्मा के साथ जुड़ाव में नहीं
- 1:28:01रहे अलगाव में आ गया और जब तुम। आनंद से अलगाव कर लोगे तो फिर?
- 1:28:12तुम दुखी ही तो हो गया? फिर सुख की कामना कैसे करते?
- 1:28:22अभी लोग काली के नाम के ऊपर मांसकार हैं शराब।
- 1:28:25पी रहे हैं। बस नाम है तुम त्योहारों के नाम
- 1:28:31के ऊपर देवी देवताओं के परमात्मा के नाम के ऊपर कुछ भी षड़यंत्र
- 1:28:36करते रहो, गारत में जाते हो। लोगों को बुद्धू नहीं बना रहे
- 1:28:45हैं। वो ध्यान से तुम खुद को ही बुद्धू
- 1:28:49बना रहे हो। तुम गलती में हो क्योंकि जिसने
- 1:28:53अपनी करुणा खो दी, उसने सब खो दिया।
- 1:29:00करुणा ही तो तुम्हें जोड़ती है। न्यूरोन नहीं तो तुम्हें वेज रही
- 1:29:11तो तुम्हें जोड़ती है न्यूरोन। के साथ।
- 1:29:17तुमने अगर पूरे का पूरा पार्ट काट के फेंक दिया तो तुम अलग हो गए।
- 1:29:26विक्षण हो गए परमात्मा से और परमात्मा से विक्षण हो के कभी कोई
- 1:29:33सुखी रह सका है तब क्या करना चाहिए था?
- 1:29:42पहली बात। आज मैंने खोल दिया जिसे तुम ऐश
- 1:29:46कहते हो, वो क्या वह बिलगाव है? परमात्मा कितने बेचारे हो गए हो
- 1:29:54तुम जो आनंद का सागर है उसे टूटकर एक बूंद बन गए।
- 1:30:03और वो बूंद सागर में मिलने के लिए तड़पती है, तड़पती है, लाखों उपाय
- 1:30:08करती है, यही दशा है तुम्हारी बिछोड़ा तुमसे सहन नहीं होता।
- 1:30:20और जब बिछोड़ा सेन नहीं होता तो बिरहा की आग तुम्हें दुख ही तो
- 1:30:26देगी सुख का तुम अनंत से अलग हो गए सेंसिटिविटी खो गई है।
- 1:30:41करुणा खो गई। सब खो जाएगा, उससे अलग होते ही सब
- 1:30:47खो जाएगा, भावना शून्य हो जाओगे, तुम संवेदनहीनता आ जाएगी तुम्हे
- 1:30:54संवेदना गयी तो सुख भी गया, आनंद भी गया, रस भी गया सब गया।
- 1:31:02जैसे शरीर के किसी पाठ के अलग होने से सुख दुख फिर उस पाठ को
- 1:31:07उबारो जलाओ, काटो पिटो कुछ करो पता नहीं चलेगा तुम्हे ऐसा ही
- 1:31:14अनंत से तुम। खुद का अलगाव कर लिया हो।
- 1:31:23फिर वह पार्ट क्या करता है? तुम उसे कहते हो, ऐश करता है कहाँ
- 1:31:28ऐश करता है भाई तुम तो बेचारे हो गए तुम तो आनंद से अलगाव करके तुम
- 1:31:37ऐश कर रहे हो। तुम इसको ऐसे कहते हो, मैं
- 1:31:44तुम्हें कहता हूँ कि तुम दया के पात्र हो, तुम पे रहम करना।
- 1:31:51चाहिए जीसको थोड़ी देर के आनंद के लिए।
- 1:31:57अंतरंग क्षणों में उतरना पड़ता है वह बेचारा ही तो है।
- 1:32:03देखो उस संत को सदा दिवाली सादकी और आठों बहरा आनंद।
- 1:32:10वह तो कोई श्राव थी, वह तो कोई अंतरंग के क्षणों में नहीं जाता।
- 1:32:14आनंद को यही तो भ्रम था। अनंत बुद्ध का बड़ा भाई था।
- 1:32:21अनंत बुद्ध से बोला मैं तुम्हारी दीक्षा तो ग्रहण कर लूँगा, लेकिन
- 1:32:27मेरी एक शर्त है मैं तुम्हारा बड़ा भाई हूँ बोध बोले बिलकुल तुम
- 1:32:33मेरे बड़े भाई हो बनते बोलो। क्या शर्त है तुम्हारी?
- 1:32:38मैं चौबीसों घंटे तुम्हारे साथ हूँ खुद कहते मुझे क्या करा रहा
- 1:32:43है कपट था मूड़ता थी आनंद के भीतर बस नाम का ही आनंद।
- 1:32:54था। वह सोचता था, यह जब खाता है, पीता
- 1:33:01है तो फिर जो वीर्य बनता है, जब मशीनरी तो काम करती है, यह संभोग
- 1:33:08भी करता होगा। बस इसी दुविधा को मिटाने के लिए।
- 1:33:14लाली मेरे लाल की जीत देखूं तितल लाली देखने में गयी, मैं भी हो
- 1:33:22गयी लाल आनंद खुद भी आनंद हो गया जब उसने देखा कि ऐसा सच्चरित्र
- 1:33:31तुम्हें उस विधान का पता ही नहीं। तुम सीधी सी भाषा सेंटिफिकल जानते
- 1:33:37हो, जब खाते है तो बनेगा वीर, फिर वीर कहाँ जाएगा?
- 1:33:41फिर तुम 100, 100 तरह की बातें करोगे।
- 1:33:46अगर नहीं अंतरंगक्षण हो गया तो ये बिगड़ जाएगा, वो बिगड़ जाएगा।
- 1:33:50आखिर में भाई सब कुछ बिगड़ जाएगा। आखिर में वार्ड नंबर 33 में पहुँच
- 1:33:58ही जाओगे। वहाँ जब लगेंगी ना इलेक्ट्रिक की
- 1:34:04800 डिग्री। सेंटिग्रेड की आग सब खत्म हो
- 1:34:12जाएगा। यही शंका थी आनंद में चौबीसों
- 1:34:20घंटे साथ रहने का मतलब क्या होता है?
- 1:34:26अच्छा बड़ा है इसने बच्चा पैदा किया है।
- 1:34:32हाइट कैन बी पॉसिबल? अब इसके शरीर के यंत्र ने क्या वो
- 1:34:39कार्य क्षमता खोदी है? क्या वो स्पर्म पर नहीं होता होता
- 1:34:45है? भाई, लेकिन दैट ट्रांसफर्स इंटू
- 1:34:51ओस बस। यह तुमने तुम्हें मैंने नई पद्धति
- 1:34:58नहीं बताई। बहुत पुरानी संतों का वीर्य और
- 1:35:03राज्य ओह ज़मीन पर वर्तित हो जाती।
- 1:35:07है बनती है और उसका भ्रम खत्म हो गया है।
- 1:35:16आनंद का सर घूम गया। जब वर्ष दो वर्ष तीन वर्ष 10 वर्ष
- 1:35:22साथ रहा उसका सर घूम गया। अरे यह व्यक्ति तो आनंद में मगन
- 1:35:30रहता है। इसको वासना उठेगी कि कैसे क्रोध
- 1:35:38तक नहीं उठता, ऐसे लोह तक नहीं उठता ऐसे तो काम कैसे उठेगा?
- 1:35:46ये क्या हुआ ट्रांसफॉर्मेशन हुआ? बदल गया सब बनेगा भाई मेरे बनेगा
- 1:35:56राज्य बनेंगे लेकिन राज्य के। बाद और भी राहतें हैं।
- 1:36:06फसल की राहत के सिवा। फिर ओज में परवर्त हो जाएगी।
- 1:36:14जब तुम इस मन को मौका नहीं दोगे, इस मन की चाकरी नहीं करोगे, इस मन
- 1:36:19के पीछे नहीं लगोगे तो फिर ये मन थक जाएगा, ये हार बार देगा, ये
- 1:36:26आत्मसमर्पण कर देगा। यह सरेंडर करते है।
- 1:36:31अच्छा भाई तुम जीते हमारे फिर मन खुराक बात नहीं करेगा, फिर आप
- 1:36:40मालिक हो जाओगे, उस दिन तुम इन्द्र होते हो, सच में।
- 1:36:45उससे पहले तो इंद्रियों के गुलाम होते हैं।
- 1:36:47उस दिन पहली दफे तुम राजा होते हो, पहली दफे तुम मन के और
- 1:36:52इंद्रियों के राजा बनते हो जब इंद्रियां और मन तुम्हारे आगे
- 1:36:57सरेंडर हो जाती। हैं।
- 1:37:00विजय भगवान कृष्ण कहते हैं कि इनको मुझे सरेंडर कर दे।
- 1:37:05और तुम सभी पापों से मुक्त हो जाते हो जब तुम्हारा मन, तुम्हारी
- 1:37:11इंद्रियाँ, तुम्हारे समक्ष तुम यानी जो हो, वास्तव में आनंद हो,
- 1:37:17तुम आनंद। जब तक तुम नहीं होगे।
- 1:37:23यही मैं कहता हूँ, राम को पता है के मज़ा तो मैं ही मज़ा तुम जब तक
- 1:37:30नहीं होगे, ये इन्द्रियाँ कुरा बंद करेंगे ही, जब राम को या
- 1:37:38तुम्हें पता चलता पता चल जाएगा के मज़ा तो मैं ही हूँ।
- 1:37:43तो इंद्रियों का सारा रस नहीं छोड़ दिया जाएगा।
- 1:37:46इंद्रियों की जैसे पोल खुल गई और इंद्रियां और मन सरेंडर कर देंगे।
- 1:37:52दे विल हैव टू सरेंडर? उन्हें समर्पण करना ही होगा
- 1:38:01क्योंकि उनकी पोल खुल गई। तुम इंद्र हुए तुम राजा हुए, अब
- 1:38:10तुम इंद्रियों के गुलाम नहीं, अब तुम इंद्रियों के मालिक हो तो मन
- 1:38:14के गुलाम नहीं, अब तुम मन के मालिक।
- 1:38:16हो फिर कृष्ण। युद्ध के कारण आदमी नहीं है, कम
- 1:38:25पड़ गए तो बच्चे पैदा करेंगे, लेकिन जरूरत है श्रावली को आगे
- 1:38:33बढ़ाने के लिए देश के लिए बच्चे पैदा करेंगे, नानक भी बच्चे पैदा
- 1:38:39करेंगे, कबीर भी करेंगे। और तुम्हें हैरानी होगी आई वुड
- 1:38:43इज़ पॉसिबल क्योंकि तुम चीज़ को जानते नहीं।
- 1:38:46ऐसी सारी प्रक्रिया मैंने आज समझा दी है।
- 1:38:48तुम्हें संत व्यक्ति जरूरत के लिए कुछ करेगा।
- 1:38:54तुम वासना के लिए कुछ करोगे, वही चीज़ तुम वासना के लिए करते हो।
- 1:39:00और संत जरूरत के लिए करता है। इसलिए कबीर के भी दो बच्चे हुए।
- 1:39:05नानक के भी दो बच्चे हुए और जिनके बच्चे नहीं हुए।
- 1:39:15उनके बच्चे तो थे बस उन्होंने घोषणा नहीं की।
- 1:39:20उन्होंने शुगरकोट हो गई को नीम के ऊपर शुगर चिढ़ा ली और फिर किताब
- 1:39:30निकाल दी। संभोग से समाधि की ओर खाक समाधि
- 1:39:33की ओर क्यों पागल? बना रहे हो?
- 1:39:40यह कोई तरीका सली का नहीं है। तुम सही कहाँ रहे?
- 1:39:45तुम कहाँ महावीर की तरह नग्न हो गए?
- 1:39:47महावीर की बातें तो कर लेते हो, वो तो जुबान है तुम्हारे, लेकिन
- 1:39:53आचार्य कहाँ है, महावीर का सा आचरण कहाँ है?
- 1:39:58बुद्ध का सा आचरण कहाँ है? कृष्ण पर बात तो कर लेते हो,
- 1:40:02लेकिन कृष्ण का सा आचरण कहाँ है? फिलॉसोफी में एमए किया पीआइ सी डी
- 1:40:13किया बाहर की खाल तो निकाल लोगे? लेकिन बाल की खाल निकालना आनंद
- 1:40:19नहीं होता ये समझ ले ना बाल की खाल निकालना आनंद नहीं होता।
- 1:40:25ओशो बाल की खाल निकाल लेंगे, वो बाल की खाल निकालते निकालते कृष्ण
- 1:40:32को भी पटकनी दे देंगे? बुद्ध को भी दे देंगे।
- 1:40:34महावीर को भी दे देंगे। लेकिन उन्हें नहीं पता कि तुम्हें
- 1:40:38भी भटकने देने वाला कभी कोई सत्य आ जाएगा क्योंकि शब्दों से कही
- 1:40:49हुई। बात।
- 1:40:52वही व्यक्ति तोड़ेगा जो अनुभव से जान लेगा, वह तुम्हारे तर्क को
- 1:40:58तोड़ देगा। नष्ट भ्रष्ट कर देगा, वह तुमसे
- 1:41:03सवाल पूछेगा पिछले दिनों में मैंने उसको की बात कही वो कहता है
- 1:41:09अब वो मर गए अगर होते ना फिर मैंने कहा अभी वो होते नहीं, वो
- 1:41:14अब है नहीं तो इसमें मेरा क्या कसूर?
- 1:41:18कोई और आ जाओ भाई ओशो जैसा कोई और आ जाओ, वो होते तो तुम्हें बताते
- 1:41:27हाँ तो भाई इस समय भी मेरा कसूर का वो नहीं है।
- 1:41:33मैं अपने समय पे आया वो अपने समय पे आया।
- 1:41:37और तुम्हें पता नहीं ओशो से मैं रोज़ मिलता हूँ, जो ओशो आज जीवन
- 1:41:44ले चूके हैं, जन्म ले चूके हैं, प्रवचन कर रहे हैं, जिनके आश्रम
- 1:41:49में आप ठहर रहे हो। ओशो नहीं ओशो तो मेरे पास आते
- 1:41:53हैं, मैं जानता हूँ उसे। और न वो मेरे गुरु हैं, न वो मेरे
- 1:41:59सखा हैं। मेरा कोई रिश्ता नाता उससे नहीं
- 1:42:04है, बस इतना ही है कि हम दोनों एक रूप हैं।
- 1:42:09हम सभी एक रूप हैं। हम एक ही तालाब की बूँदें हैं।
- 1:42:14हम एक ही सरोवर के बोते हैं और ये बहुत बड़ा नाका है।
- 1:42:25तो तुमने कहा दिन बंद हो, कोई शराब से अयाशी करता है नहीं, ये
- 1:42:33बेचारे इतने लाचार हैं। ये दया के पात्र हैं।
- 1:42:36इन्हें थोड़ी देर के लिए बेहोशी के लिए शराब की मदद लेनी पड़ती
- 1:42:41है। वो तो मज़े से सो जाते हैं।
- 1:42:47बिना शराब पिया कोई सेहवाब का मज़ा लेता है, इतनी कीमती धातु
- 1:42:54तुम गवा देते हो? एक सुराग के जरिए फल भर का दर्शन
- 1:42:59करने के लिए और कृष्ण तो उसमें जा विराजते हैं।
- 1:43:04सती प्रज्ञा ओजा अर्जुन तुम एक झलक पाने के लिए फिर से उसकी झलक
- 1:43:12पाना चाहते हो। देखो तुम कितने गरीब हो।
- 1:43:15कितने असहाय हो तुम दया के पात्र हो, एक पल के आनंद के लिए तुम
- 1:43:25इतना खजाना लुटा देते हो और नसीब होता है।
- 1:43:28एक पल आनंद। फिर झल्ला कर मारकस कहते हैं नहीं
- 1:43:38है परमात्मा सही है सत्य है ईमानदार क्योंकि उसकी जिंदगी में
- 1:43:47आनंद उतरा ही नहीं तो वो सही कह रहा है कि नहीं है परमात्मा?
- 1:43:54उसने सुख ही जाना, इसलिए सुख को ही परमात्मा माना तो ठीक बोल रहा
- 1:44:01है। वो कहता है कि नहीं है परमात्मा
- 1:44:03नीत से कहता नहीं है परमात्मा ज़िन्दगी के 11 वर्ष उसने पागलपन
- 1:44:10में गुजारे। घर से भाग जाता वो देखो कौन आ रहा
- 1:44:16वो पीछा कर रहा मुझे मार देगा कृष्ण को कोई मार नहीं हो सकता
- 1:44:23नीत से कोई मार। सकता है।
- 1:44:25कृष्ण जानते हैं मैं रहस्य हूँ। शराफ, कितने दिन हीन हो, तुम खुद
- 1:44:38मेखाना होकर नकली मेखानू से बोतलें करी कमाल तुम दया के पात्र
- 1:44:49हो। आनंद का सागर हो तुम एक पल आनंद
- 1:44:59की झलक पाने के लिए अपना इतना कीमती धातु बर्बाद कर देते हैं।
- 1:45:07दीनहीन हो? तुम दया के पात्र हो तुम इसलिए
- 1:45:11तुम्हें समझाने भी लोग आ जाते हैं क्योंकि वो तुम जैसे ही हैं।
- 1:45:17वो कहते हैं नहीं नहीं, ऐसा कुछ नहीं होता, तुम दिन में दो बार तो
- 1:45:21जरूर ही अंतरंग क्षणों में जाया करो अन्यथा जल्दी मर जाओगे।
- 1:45:27तो क्या दो बार अंतरंग लक्षणों में जाने से तुम नहीं?
- 1:45:30मरोगे। फिर तुम अमर हो जाओ।
- 1:45:37अमरत्व का तो यही रास्ता है जो मैंने बताया जो कबीर ने बताया जो
- 1:45:43नानक ने बताया। जो कृष्ण ने बताया जो लालू ने
- 1:45:47बताया अमरत्व का एक रास्ता वही है गद्दी नशीं हो जाओ अमरत्व नहीं
- 1:45:54मिलेगा धनाधीश हो जाओ अमरत्व नहीं मिलेगा बाहर के कितने ही पदार्थ
- 1:46:01सारी दुनिया के चक्रवर्ती सम्राट हो जाओ।
- 1:46:04आनंद नहीं मिलेगा आनंद तुम्हारे भीतर का स्वभाव है आनंद तुम्हारे
- 1:46:10भीतर है मत ढूँढो इसको बाहर। भीतर है।
- 1:46:19जहाँ चीज़ होती है वहीं पे ही मिलती है।
- 1:46:24वस्तु ठोर की ठोर जो ठोर है, जहाँ पर छोड़ के गए तुम वहीं पे
- 1:46:32मिलेंगे तुम्हें वहीं पे ढूंढो, वहीं पे जाओ उसी तल को छूओ
- 1:46:37तुम्हें मिलेगा शराब। थोड़ी सी देर के बेहोशी के लिए
- 1:46:45तुम शरीर का इतना गला देते हो, अंग तुम्हारा शरीर का भीतरी अंग
- 1:46:50बड़ा कोमल होता है, और शराब एक प्रकार का तेज़ाब।
- 1:46:56होता है। और इस तेज़ाब को तुम पी लेते हो?
- 1:46:59मैंने तुम्हें बताया ना? हड्डी में सुराग कर दिया।
- 1:47:02उसने किसको तुम पीते हो? थोड़ी देर के लिए बेहोशी?
- 1:47:09ही रह गया। काम वासन का इस्तेमाल करते हो
- 1:47:14एनर्जी लेस्सनेस के लिए नींद अच्छी आ जाएगी बस इतनी सी कीमत है
- 1:47:20इसकी। जो खजाना तुमने लुटा दिया है इसको
- 1:47:26ओज में परिवर्तन करो, ओज में परिवर्तित करके यह तुम्हें आनंद
- 1:47:32के मुकाम तक ले जाने का वाहन बन सकता।
- 1:47:35है। इसका सदुपयोग करो, दुरूपयोग न
- 1:47:39करो। कबाब।
- 1:47:45तुम में इतनी भी करुणा नहीं बचे, इतने पत्थर हो गए हो तुम क्यों हो
- 1:47:54गए कि तुमने आनंद से अपना संबंध विछेद कर दिया हो?
- 1:47:59तुम्हारा अंग कट के अनंत से अलग हो गया तो क्या खाक करना आएगी?
- 1:48:07तुम्हें तो मेमनों को काटकर हो हल्ला मचाओगे और बकरीद बनाओगे।
- 1:48:18यह गुंडापन है। या धार्मिकता यह गुंडापन है
- 1:48:32धार्मिकता तो। किसी को सोई भी चुभते हुए देख
- 1:48:37नहीं सकती, चुभाने की बात छोड़ो जीसको पता चल गया सब मैं हूँ, तुम
- 1:48:45अपने बच्चों को कांटा चुभने देते हो, बस उसके लिए सभी मैं हो जाता।
- 1:48:53है। कितना बचा के चलते हो मेरे किसी
- 1:48:57अंग में कांटा न छूब जाए, जिसके लिए सब अनंत मैं हो गया।
- 1:49:06वह किसको काटेगा, क्यों काटेगा? वह इतना करुणावान हो गया।
- 1:49:14बुद्ध कितने कर्णमान हो गए कभी कभी बुद्ध की इस बात से मेरी
- 1:49:23आँखों में आंसू छलक जाते हैं कि बुद्ध ने उस परमात्मा को छोड़
- 1:49:30दिया तुम्हारे। कारण?
- 1:49:33इतने कोरोनावान थे पता था, लेकिन फिर भी तुम्हारा मन रखने के लिए
- 1:49:41कहते हैं पर मत मैं नहीं, जबकि जो व्यक्ति उस तल पर अपने आप के होने
- 1:49:48के तल पर पहुँच जाता है। साफ जीने जीने पर्दे के पीछे
- 1:49:52परमात्मा नज़र आता। है।
- 1:49:57ये है लक्षण है और। जिसने देख लिया उससे क्या छुपाओगे
- 1:50:03हमने देखा है भाई मैं कहता आंखन देखूं।
- 1:50:08तुम कहते कागज के लेखी कबीर से क्या छुपाओगे मुझसे क्या छुपाओगे
- 1:50:15सब जानते हैं वो? जीस अबुद्ध की बात करते हैं उस
- 1:50:22अबुद्ध ने ब्रह्मचर्य को सादानी सध गया।
- 1:50:27और अगर उसके दर्शन करने के पश्चात भी ब्रह्मचर्य न सधे तो वह दर्शन
- 1:50:34झूठा है। जी अब उस परम के दर्शन करने के
- 1:50:42उपरांत भी। तुम लिबरल सेक्स की बात करो तो
- 1:50:50दर्शन झूठा है भाई क्योंकि उसके दर्शन का एक लक्षण ये भी है काम
- 1:50:59वासना खत्म हो जाती है फिर काम वासना को तुम गुलाम की तरह प्रयोग
- 1:51:04करो तो करो। आनंद की तरह प्रयोग नहीं करोगे,
- 1:51:08लेकिन आज तो तुम देखो मुझे रोज़ शिकायतें आती हैं और हम फंस गए।
- 1:51:14बाबा हम अपनी पूंजी लुढ़ा बैठ हमसे धोखा हो गया, अब क्या करें?
- 1:51:21मैं उन्हें कोई जवाब नहीं देता। अपन हाथ खड़े भाई।
- 1:51:28अब ऐसा मूर्ख व्यक्ति आया जिसने ये चीज़ चलाई।
- 1:51:34लिबरल सेक्स की दुकानें खुली हुई हैं।
- 1:51:37धार्मिकता के नाम पर क्या कहा जाए?
- 1:51:43धार्मिकता के नाम पर? सब लूट गया आज कतलो गारथ को
- 1:51:52अध्यात्मिक बना दिया फिर काटू में हम ना बकरीद मनाओ करो लिबरल
- 1:51:59सेक्स, ओशोबादी कहलो कहो ओशो। क्या मजाक है, कहाँ थे हम कहाँ
- 1:52:12पहुँच गए, लेकिन तार्किक की शक्ति?
- 1:52:23क्योंकि ओशो पढ़े लिखे हैं, शब्दावली घनी है।
- 1:52:261,00,000 किताबें जिसने पढ़ी वो उल्टी ही तो करे मुझे कहते हैं
- 1:52:31इतना साहित्य छोड़ के गया। बिल्कुल छोड़ के गया गलती में
- 1:52:35पढ़ना, ये उड़ती है सारी। सारी वमन किया है।
- 1:52:39ये पछता नहीं है, बाहर का आया हुआ हुआ ये बाहर से आया पछता नहीं है
- 1:52:46डाइजेस्ट नहीं होता ये वो मटेरियल है जैसे हम बीजा दिया है।
- 1:52:58यह शरीर नहीं बचा पाता। सर शरीर इंकार कर देता है।
- 1:53:05धर्मो के नाम के ऊपर कचरा हो रहा है, धर्मो के नाम के ऊपर सेक्स हो
- 1:53:10रहा है। बस इसी की ही कम थी प्रभु ये आपने
- 1:53:15मिटा दी ओशोजी। इसी की कमी थी अन्यथा कतलोगार तो
- 1:53:23पहले ही चल रहा था। बकरीद के नाम तुम्हारे अश्वमेध
- 1:53:31यज्ञ कर रहे थे, नरमेद यज्ञ कर रहे थे, छोड़ो।
- 1:53:37बकरों की बलि तुम भी देते हो भैंसों की बलि तुम भी देते हो
- 1:53:41काली के नाम पर। क्या क्या न स है हम न सितम आपकी
- 1:54:05खातिर क्या क्या न स है हम न सितम।
- 1:54:15आपकी खातिर ये जान भी जाएगी सनम, आपकी खातिर ये जान भी।
- 1:54:32जाएगी सनम आपकी खातिर क्या क्या ना सहे ये धर्म के लिए हमने क्या
- 1:54:42क्या नहीं हमने सितम आपकी खाता, ये जान भी जाएगी सनम आपकी खाता।
- 1:54:52ये धर्म ऐसा रोग है उखाड़ फेंको इन धर्मों को मैंने नव धर्म का
- 1:55:02निर्माण किया जो धर्म नहीं है, जो तुम्हारा स्वभाव है खाओ, पियो
- 1:55:08आनंद करो। खाते हो पीते हो आनंद करो आनंद
- 1:55:12नहीं मिलता तुम्हें मोक्ष द्वार पे आ जाओ आनंद तुम्हें मैं दे
- 1:55:20दूंगा मेरे पास में है भूल जाओ उन आनंदों को।
- 1:55:28जो तुम्हारे नकली संतों ने फैक्ट्रियों में बना के तुम्हें
- 1:55:32पिलाया, मैं तुम्हें धरती की गर्व को फाड़ कर निकला हुआ आनंद दूंगा
- 1:55:42जो श्रद्धा के लिए। डायमंड इज़ फार एवर वो हीरा है जो
- 1:55:50सदा के लिए है यहाँ तक तुम्हें मैं पहुंचाना चाहता हूँ दीन हीन
- 1:55:58मत बनो। शराब पीने वाले को शबाब के लिए
- 1:56:04भोगने वाले को। कबाब खाने वाले को तुम अयाशी कहते
- 1:56:10हो, कितने गर्ख गए हो तुम? तुम्हारी परिभाषाएं कितनी विकृत
- 1:56:15हो गई हैं ये बताती हैं कि तुमने। वो आयाम पाया नहीं।
- 1:56:23तुम कितने दीनहीन हो। आओ।
- 1:56:27मेरे संग चलो, ओह मैं तुम्हे सितारों पे ले चलो।
- 1:56:37दिल ठुम जा ऐसी बहारों में। ले चलो आओ हजूर, तुम को सितारों
- 1:56:57पे ले चलो, दिल झूम जाए। ऐसी बहारों में ले चलूँ आओ हजूर
- 1:57:15तुमको। धन्यवाद।