Latest / Baba ji Vijay Vats / 21 Jul 25 - भीतर की यात्रा की चाबी! आत्मा के 3 गहरे तल – दुर्वासा ऋषि का क्रोध और ध्यान की शक्ति!
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- 0:09प्राचीन ग्रंथों में दरवसा ऋषि का बहुत ही जगह होता है।
- 0:23दरवाजा ऋषि एक ऐसे क्रोधि ऋषि जो किसी को भी शराब दे देते हैं
- 0:34कितना भी बली क्यों न हो। पर कहते हैं कि वो पहुंचे हुए भी
- 0:45थे। बाबा कृपा करके हमें बताने का
- 0:58कष्ट करें के उस शीतल तल को छूने के बाद।
- 1:07भी व्यक्ति में क्रोध शेष रह जाता है, फिर वह किसी को श्राप क्यों
- 1:17देता है? यह बात संत से परे है।
- 1:27दुर्वासा ऋषि भी हैं और क्रोध ही भी हैं।
- 1:32कृपया इस दुविधा का निवारण करने का कष्ट करें।
- 1:35गीतेश हरियाणा से अति सूक्ष्म प्रश्न है, समझने की चेष्टा करें।
- 1:54जब तक हम ऊपर ऊपर के सतह पे बैठे हुए हैं, बुद्धि में बैठे हुए
- 2:06हैं, ब्रेन में तो हम संकल्प नहीं कर सकते।
- 2:15संकल्प के नाम पर सिर्फ कॉन्सन्ट्रेशन कर सकते हो।
- 2:19एकाग्रता, एकाग्रता और संकल्प में बहुत विशाल अंतर है।
- 2:32एकाग्रता ऐसी है जैसे सूरज की करणों को कॉन्वेक्स लेंस के
- 2:40द्वारा एक कागज के ऊपर इकट्ठी कर ली जाएं और उससे वो जल चढ़ाएं।
- 2:50और संकल्प ऐसे है जैसे सूर्य खुद जलता हुआ सूर्य की धरती पे अजा
- 2:58है, इतफर्क है दोनों में ध्यान से सुन एक शब्द को ध्यान से सुन।
- 3:14यद्यपि यह प्रश्न समझ में आने योग्य नहीं है।
- 3:19कोई भी अध्यात्मिक प्रश्न समझ में आ जाएगा, ये समझना मत समझ में
- 3:30नहीं आएगा। लेकिन जो इशारे करता है व्यक्ति
- 3:35वो आपको समझ में आ सकता है और शायद इन इशारों के बलबूते पर
- 3:45स्ट्रीट लाइन पर अगर आप देखोगे तो बात भी समझा जाएगी।
- 3:56ऐसा समझो कि हम संकल्प के तीन सतर्क रहते है।
- 4:08पहला स्तर खोपड़ी का, बुद्धि का दूसरा स्तर, हृदय का, इमोशन्स का।
- 4:17भावनाओं का और तीसरा स्तर स्वयं के होने का अस्तित्व का
- 4:28एक्जिस्टेंस का ये तीन स्तर है। बुद्धि की कॉन्सन्ट्रेशन बुद्धि
- 4:42का संकल्प जिसे हम कॉन्सन्ट्रेशन भी कह सकते है, वह कोई ज्यादा
- 4:53गहरा नहीं होता। बल्ब तो होता है उसमें लेकिन
- 4:59ज्यादा। घणी भूत बल नहीं होता बुद्धि जब
- 5:06संकल्प लिखी है यह बड़ा उथला उथला सा होता है, जैसे आप प्रण कर लिया
- 5:18आपने। कि मैं आज के बाद शराब नहीं
- 5:22पाऊंगा। यह प्रण आपने बुद्धि से लिया।
- 5:28अगर तो ज्यादा संभावना है कि आप डोल जाओ।
- 5:40क्योंकि बुद्धि का संकल्प ज्यादा मायने रखता नहीं, ज्यादा बल नहीं
- 5:46होता, उसका बुद्धि सीमित बल से युक्त है, इसलिए उसका संकल्प भी
- 5:55सीमित है। अब थोड़ा गहरे ही करें बुद्धि से
- 6:09यात्रा शुरू करो हृदय में उतरो, हृदय से जो संकल्प आएगा।
- 6:23उसमें आवाज कम होगी, भावना ज्यादा होगी।
- 6:31वो बुद्धि के संकल्प से ज्यादा गहरा होगा।
- 6:37तुमने कभी देखा अगर कोई आपके सामने व्यक्ति।
- 6:42क्रूर काम कर रहा है तो आपकी बुद्धि उस व्यक्ति को कहती है कि
- 6:51तुझे लज्जा आनी चाहिए, शर्म आनी चाहिए, ऐसा ऐसा कुछ बोलकर बुद्धि
- 6:58शांत हो जाती है। लेकिन हृदय थोड़ा गहरा जब वो
- 7:08देखता है किसी बकरे को कटते किसी मुर्गे को कटते।
- 7:20तो बुद्धि से आवाज़ नहीं आती, वो आवाज़ हृदय से आती है, बुद्धि में
- 7:26प्रकट होती है। इन शब्दों को ठीक से समझ लेना आती
- 7:31हृदय से है, प्रकट होती है बुद्धि से प्रकट तो श्रद्धा ही बुद्धि से
- 7:36होगी, वो चाहे प्रेम होगा। चाहे अहंकार होगा, चाहे क्रोध
- 7:41होगा, प्रकट करेगी। बुद्धि चाहे बुद्धि के तल से बोला
- 7:48गया हो, चाहे हृदय के तल से बोला गया हो, प्रकट करेगी बुद्धि।
- 7:58जो बुद्धि के तल से बोला गया किसी को कुकृत्य करते हुए बुद्धि कहे
- 8:05कि तुझे शर्म आनी चाहिए। इतना घिनौना काम करते हुए तुझे
- 8:10लज्जा नहीं आई? बस बुद्धि इतना सही बोल सकती है।
- 8:17ज्यादा से ज्यादा गाली लोच कर देगी।
- 8:24लेकिन हृदय पूरा गहरा है। हृदय की आवाज बुद्धि से कहीं
- 8:33ज्यादा गहरी है। बुद्धि भी रोती है लेकिन उस रोने
- 8:44का ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ता। हृदय भी रोता है, लेकिन उसका
- 8:50प्रभाव बुद्धि से अनंत गुणा ज्यादा होता है।
- 8:56हृदय जब रोता है। तो बुद्धि की चुल्लें ही जाती है
- 9:07अभाव से, रोना और प्रेम से और व्यथा से रोना।
- 9:12इन दोनों में बड़ा फर्क है। प्रेम में व्यक्ति रोता है, बड़ा
- 9:19गहरा रोता है। बुद्धि से व्यक्ति रोता है, अभाव
- 9:25से रोता है या किसी और कारण से रोता है, दर्द से रोता है?
- 9:34मैं इतना गहरा नहीं होता। बुद्धि से ज्यादा गहरा हृदय।
- 9:41संकल्प हृदय से भी आता है, संकल्प और बुद्धि से भी आता है, लेकिन
- 9:47बुद्धि के संकल्प से हृदय का संकल्प कहीं ज्यादा शक्तिशाली
- 9:53होता है। अगर से शराब के रूप में ले गया तो
- 10:02बुद्धि शराब दे सकती है, ज्यादा से ज्यादा गाली गलोच कर देगी।
- 10:09उंट शंटर बोल देगी तुम्हें बेइज्जत कर देगी।
- 10:17समाज में बदनाम कर देगी, लोगों के सामने बदनाम कर देगी।
- 10:21बुद्धि तनाशा कर सकती है, लेकिन हृदय हृदय बोलता नहीं।
- 10:31हृदय की आवाज़ मौन के ज्यादा करीब है।
- 10:37हृदय से जो आवाज़ उठती है, संकल्प उठता है और बुद्धि से कहीं ज्यादा
- 10:44गहरा है और जब हृदय रोता है किसी को कुकृत्य करते हुए देखकर।
- 10:58तो उसके संकल्प में गहराई बहुत ज्यादा होती है।
- 11:05तीसरा तल आता है स्वयं का अस्तित्व का जहाँ तुम स्वयं हो।
- 11:18वह परम संकल्प की स्थान है। वहाँ तुम स्वयं विराजमान हो और
- 11:25तुम्हारी बाल का कोई और छोर नहीं तुम असीमित बल से युक्त हो।
- 11:37तुम असीमत प्रेम से भी उपद हो क्योंकि तुम्हारे भीतर दोनों
- 11:44चीजें असीम हैं, ऊर्जा भी असीम है और चेतना भी असीम है ये दोनों
- 11:50चीजों का संग्रह। असीमित रूप में जब इकट्ठा हो जाता
- 11:58है तो तुम्हारा स्वयं हो जाता है शब्द गहरे है, लेकिन बड़ी सरलता
- 12:04से बोल रहा हूँ अब समझिये। शराब बुद्धि से भी दिया जा सकता
- 12:15है, लेकिन उसके संकल्प की मात्रा अत्यंत अल्प होगी।
- 12:21थोड़ी सी मात्रा होगी, वो इतना काम नहीं कर पाएगा।
- 12:27बुद्धि का संकल्प। तुम्हें समाज में बदनाम कर देगा,
- 12:33लोगों में बदनाम कर देगा, गाली गलोच कर लेगा, अभद्र शब्दों का
- 12:43प्रयोग कर लेगा। उससे तुम्हारा कुछ ज्यादा बिगड़ता
- 12:53है। उससे गौरव हृदय का संकल्प एक बात
- 13:03ध्यान में रखना जूं जूं तुम बुद्धि से भी बाहर भटकोगे।
- 13:11जीऊजून तुम बुद्धि से भी बाहर भटकोगे, तुम क्रीप।
- 13:16संकल्पहीन अवस्था में आ जाओगे। और आज ऐसी ही धरती हो गई है, बड़े
- 13:25दुःख की बात है। कि धरती का प्रतीक मानव आज बाहरी
- 13:35चीजों में व्यस्त है, व्यग्र है। उन्हें पाने के।
- 13:39लिए तो उसकी सारी शक्ति बाहर बिखरी हुई है।
- 13:46खिंडी हुई है। ऐसा व्यक्ति उसमें संकल्प शून्य
- 13:55होता है क्योंकि सारी शक्ति जो संकल्प वरना थी वह भारी पदार्थों
- 14:03को पाने में खो गई। लूटपाट में छिन गई मुकाबला बाजों
- 14:09में छिन गई कॉम्पटीशन में कंपैरिजन में सूचनाओं को इकट्ठा
- 14:20करने में या पदार्थों को इकट्ठा करने में, पदलियों को कैट्ठा करने
- 14:24में। द्रव्यों को इकट्ठा करने में
- 14:31उपाधियों को इकट्ठा करने में मान सम्मान को इकट्ठा करने में फलावर
- 14:37को इकट्ठा करने में उसकी सारी शक्ति लग गई।
- 14:43शेष का बचा शून्य। यह व्यक्ति बाहर से संबंधित होगा,
- 14:57जिसकी अटैचमेंट होगी बाहर से बाहरी संसार से।
- 15:03एक एक शब्द को। ध्यान से सुनें।
- 15:08जिसकी अटैचमेंट होगी। बाहर के संसार से वह क्रीव क्रीव
- 15:16संकल्पहीन अवस्था में होगा। वह इंसान ठहरा हुआ नहीं होगा, वह
- 15:26इंसान भागता हुआ होगा। जैसे किसी दौड़ में शामिल हो
- 15:32निरंतर भाग रहा है। आपने कभी देखा किसी व्यक्ति को?
- 15:39कुर्सी पर बैठा है, लेकिन। पांव मिला रहा है क्या हो रहा है?
- 15:46वो कुर्सी में बैठा है लेकिन वो दौड़ रहा है।
- 15:50उसे याद नहीं कि मैं बैठा हूँ, उसका मन दौड़ में उलझा हुआ है।
- 16:00जब तुम उसे। याद कर रहोगे ये क्या हो रहा है,
- 16:03पांव क्यों हिला रहे हो तो उसे याद आएगा।
- 16:07लेकिन जैसे ही। वो।
- 16:09बेहोश हो जाएगा, फिर फिर लाने लगेगा।
- 16:13बाहरी व्यक्ति की स्थिति करीब की वैसी हो जाती है।
- 16:23बाहरी द्रव्यों में वो घूमता है। बाहरी।
- 16:28द्रव्यों को पाने की शिक्षा। करता है।
- 16:32अब कुछ भी हो मैंने आपको पहले भी देना दिया।
- 16:35सूचनाएं भी हो सकती हैं। तुम सूचनाओं को इकट्ठा करके सर भी
- 16:39बन सकते हो, वो सूचनाएं। भौतिक भी हो सकती हैं, वो सूचनाएं
- 16:46आध्यात्मिक भी हो सकती हैं। यह बड़े पैसे की बात है।
- 16:52अध्यात्मिक सदा अनुभव होते हैं, लेकिन आध्यात्मिक सूचनाएं भी हो
- 16:57सकती हैं। ये आचार्य लोग ऐसे ही आध्यात्मिक
- 17:04सूचनाओं से युक्त हैं। अध्यात्मिक अनुभव नहीं है इनके
- 17:08पास, क्योंकि अगर अध्यात्मिक अनुभव होता तो बहुत गहरे से बातों
- 17:14का जवाब देते हैं और इनके आवास में कृषि श्रोति मौन होता है।
- 17:22खुंवारी भी होता है, आनंद भी होता है, खेलावत भी होती है, खुशबू भी
- 17:29आती है, सूचनाएं संसार की नहीं होती, अध्यात्मिक भी होती है।
- 17:43आपको बताया संसारित छूटने सब लोगों के पास है वो भी आपकी
- 17:52वासनाओं की पूर्ति करेंगे, बेहतर तरीके से करेंगे जो ज्यादा बढ़िया
- 17:59पढ़ा देता है जो आपको क्वालीफाई कर देता है।
- 18:04उसको आप बढ़िया सर मानो आप कहते हो वहाँ पर अडमिशन लेना होने और
- 18:13जिसका रिसाल्ट कोई ज्यादा बढ़िया नहीं आता उसको आप कहते हो नहीं
- 18:17उसका रिज़ल्ट बढ़िया नहीं आया, वो ज्यादा अच्छा सर नहीं।
- 18:23दोनों के पास सूचनाएँ हैं बस प्रकृति करने के ढंग किसी के
- 18:28ज्यादा अच्छी किसी के थोड़े कम किसी के प्रभाव ही हैं ऐसे ही हैं
- 18:39अब बाहर ही बात कर रहा हूँ अभी मैं भीतर नहीं प्रवेश किया हूँ।
- 18:42अभी हृदय के तल। तक खड़ा हूँ।
- 18:44मैं ऐसी ही आध्यात्मिक सूचनाएं भी होती हैं।
- 18:53कुछ वेद से इकट्ठा कर लिया, कुछ उपनिश्चित से इकट्ठा कर लिया, कुछ
- 18:58कठदर्शन से इकट्ठा कर लिया। व्यास के बाद रहा।
- 19:10इनके कुछ वेदांत से इकट्ठा कर लिया, कुछ किताबें पढ़नी, कुछ
- 19:15किताबें लिख दीं, कुछ शिष्य बना लिए, कुछ खुद सीख लिया किताबों
- 19:23से, लेकिन ये बाहरी जान है। किताबों से सीख लिया तो भी बाहरी
- 19:32किसी गुरु से सीख लिया तो भी बाहरी लेकिन ज्ञान बाहरी एक इंसी
- 19:42की तरह आंतरिक ज्ञान भी होता है, उसकी बात हम बात नहीं करेंगे।
- 19:53मैंने दो तल गिराए हैं एक बुद्धि का तल, एक हृदय का तल, लेकिन ये
- 20:02दोनों तल शरीर के तल क्योंकि बुद्धि और मस्तिष्क।
- 20:12कथा हृदय ये आपस में कोने तो है, हृदय दुखी हो तो बुद्धि सुखी नहीं
- 20:25रह सकती। और बुद्धि दुखी हो तो हृदय सुखी
- 20:32नहीं, ये इंटरकनेक्टेड हैं। अगर कोई गम हो गया बुद्धि को कोई
- 20:41फिकर हो गया तो हृदय भी वैसे ही काम करेगा, हार्टबीट बढ़ जाएगी,
- 20:48घट जाएगी। ऐसा कह सकते हो शरीर और मन ये आपस
- 20:58में दो नहीं है, एक है मन शरीर का सूक्ष्म हिस्सा है और शरीर मन का।
- 21:09स्थोल हिस्सा है, मन भी और बुद्धि भी दोनों संकल्प पैदा करते हैं
- 21:22बुद्धि थोड़ा सा कम गणत्व का संकल्प और मन थोड़ा सा।
- 21:29ज्यादा घणत्व का संकल्प पैदा करता है बुद्धि का संकल्प उथला उथला मन
- 21:42का संकल्प गहरा गहरा यहाँ तक समझा दी आपको।
- 21:48आप सभी को समझाओगे चल हम आगे चलते हैं यहाँ तथा संसार जिसकी बातें
- 22:01में करता था सूचनाओं से समझ में आ जाता है, हृदय की बातें भी समझ
- 22:07में आती हैं। बुद्धि की बातें तो बिल्कुल समझ
- 22:11में आती है। जैसे जैसे तुम गहरे चलते जाओगे
- 22:16वैसे वैसे समझ में कमी आती जाएगी। बुद्धि के बिल्कुल बाहरी तल पर
- 22:25बैठे ज्यादा समझायेगी। और बुद्धि से गहरे उतरे, हृदय में
- 22:31तो कम समझायेंगे, बुद्धि की तुलना में हृदय पे जाके कम समझाएगी
- 22:40क्योंकि हृदय के संकल्प ज्यादा है और विवेक है, बुद्धि कम है।
- 22:49यहाँ तक मैंने आपको समझा दिया। बुद्धि कम संकल्प पैदा करती है और
- 22:58हृदय ज्यादा संकल्प पैदा करता है। बुद्धि रोती है तो कोई ज्यादा
- 23:04नहीं बिगड़ता। हृदय रोता है तो बहुत ज्यादा
- 23:08बिगड़ जाता है। आइए ऐसे नीचे चले इससे नीचे जैसे
- 23:17जैसे हम चलेंगे गहरे में उतरेंगे। जिन खोजा तन, पानी, गहरे पानी
- 23:24पैठ। जैसे जैसे तुम गहरे उतरते जाओगे,
- 23:30उस पानी में उतरोगे जीस पानी में उतरकर उसकी खोज हो जाती है।
- 23:37तिन खोजा तिन पानी, गहरे पानी बैठ।
- 23:44इस गहराई में उतरना पड़ेगा और तुम जैसे जैसे गहराई में उतरोगे वैसे
- 23:55वैसे तुम्हारी संकल्प की मात्रा बढ़ती जाएगी।
- 24:04बुद्धि का किया हुआ संकल्प कुछ गुल खिलाएगा ना खिलाएगा हृदय का
- 24:11किया हुआ संकल्प कुछ गुल तो खिलाएगा, लेकिन जैसे जैसे तुम
- 24:16अंदर चलते जाओगे, वैसे वैसे संकल्प गहरा होता जाएगा और वैसे
- 24:22वैसे गुल ज्यादा खेलेंगे। फिर तुम एक ऐसे तन पर आ जाओगे
- 24:32जहाँ से शराब भी आता है, वरदान भी आता है।
- 24:37दोनों चीजें आती है सिर्फ शराब ही नहीं।
- 24:44जी हाँ। दरवाजन वरदान भी बहुत ही।
- 24:49है। वरदानों का जिक्र नहीं शराबपन का
- 24:56जिक्र है। और वरदान भी वैसे ही संकल्प से
- 25:02आते हैं, उतने ही संकल्प से आते हैं।
- 25:07किसी भी बात को सत्य करना हो तो संकल्प आवश्यक है बुद्धि के स्तर
- 25:13पर। संकल्प कम है तो तुम्हारी कई गलत
- 25:17बात हुई कम। और अच्छी बात भी कम मायने रखोगे
- 25:24उसमें बल कम होगा। हृदय के तल पे कहीं गई खुशी के
- 25:31बाद या दुःख की बात बिरहा की बात ज्यादा फलीभूत हो के ज्यादा फल
- 25:36लेके आएगा। और जैसे जैसे हम गहरे उतरेंगे, हम
- 25:44और गहरे और गहरे उतरते जाएंगे तो संकल्प हमारा गहरा होता जाएगा।
- 25:54यानी कि हम। ज्यादा शक्ति संपन्न हो जाएगी।
- 26:00चेतना और शक्ति ज्यादा हो जाएगी। हमारे यहाँ जब व्यक्ति गहरे उतरता
- 26:10उतरता अपने उस छोर पर पहुँच जाता है।
- 26:16यहाँ बुद्ध बैठे हैं, यहाँ महावीर भी आकर गुजरते हैं वहाँ से।
- 26:23कबीर भी जाते हैं, नानक भी जाते, कृष्ण भी जाते हैं।
- 26:27यह पथ अनवार्य है, यहाँ से होकर गुजरना पड़ता है।
- 26:35लेकिन इससे अभी भी मुकाम। है।
- 26:38बुध यहाँ रुक जाती है क्योंकि बुध कहते हैं संसार दुख है और इस दुख
- 26:51को दूर करने का उपाय है। और बुद्ध कहते हैं कि इस दुःख को
- 27:00दूर करने की उपाय को ही मार्ग कहते हैं।
- 27:06जब तुम्हारा दुःख दूर हो जाएगा, तुम्हें क्या मिलेगा, चैन मिलेगा,
- 27:15शांति मिलेंगे, सुकून मिलेगा। शस्त्रार्थ करने वाले लोग बहस
- 27:31करने वाले लोग मूर्ख होते हैं, ये मैं क्यूँ कहता हूँ वास्तव में
- 27:41मूर्ख होते हैं जब तुम पहुंचोगे। उस मुकाम पे चलना शुरू हो जाओगे
- 27:46उस रास्ते को तुम नापना शुरू कर दोगे तो तुम्हें समझी में आना
- 27:54शुरू हो जाएगा कि जो परमात्मा की व्याख्या करता है।
- 28:03उससे बड़ा मूड कोई। बस परमात्मा के बारे में सिर्फ।
- 28:08एक बात बोली जा सकती है वह आनंद है, सदा से है, कभी मरेगा नहीं।
- 28:18अकाल मुहूर्त काल उसे ग्रसित नहीं करता।
- 28:26अजूनी वह किसी विशेष यूनी में नहीं है या वह जन्म।
- 28:33मरण के बंधन से मुक्त है कोई अर्थ कर लो सेपन।
- 28:40खुद ही अपने प्रकाश से प्रकाशमान है।
- 28:44निर्वय कोई वैर नहीं, किसी से उसका निरप्र, कोई भय नहीं किसी
- 28:51से, क्योंकि दूसरा कोई नहीं है तो वह किस्से करेगा और वह किस्से
- 28:55करेगा। दूसरा मिट गया।
- 28:58और वहाँ जाके दूसरा मठ जाता। है।
- 29:03हम आये थे उस पॉइंट पे जहाँ बुद्ध भी जाते, महावीर भी जाते, नानक
- 29:08कबीर भी जाते, कृष्ण भी जाते, मेरा भी जाती, दया भी जाती,
- 29:12राबिया भी जाती। एक ऐसा प्वाइंट है जहाँ से होकर
- 29:22गुजरना पड़ता है और जहाँ जाकर सब द्वंद खत्म हो जाती हैं।
- 29:32जहाँ जाकर दुख दूर हो जाती हैं, पीड़ाएं खत्म हो जाती हैं, समाधान
- 29:36मिल जाते हैं, समाधि कहते है, लेकिन मैं तुमसे कहती हूँ, यह
- 29:46अंतरिम स्थिति नहीं है, मुकाम से आगे भी।
- 29:55कोई यहाँ रुक जाये तो रुक जाये। उसने आखिरी तत्व मार दिया।
- 30:06उसने वो इलूशन जीस कारण से था वह गांठ बोलें।
- 30:11गांठ क्या की लूज़िंग की वो एमआइ मैं कौन हूँ?
- 30:16यह बुद्ध ने खोल दिया मैं कौन हूँ?
- 30:19मैं शरीर नहीं हूँ, मैं विचार नहीं हूँ, मैं मन नहीं हूँ, मैं
- 30:25इनसे पार हूँ, यही गांठ दर्द का कारण होती है।
- 30:31पीड़ा का कारण होती है, दुख का कारण होती है और बुद्ध ऐसे
- 30:38व्यक्ति हैं के बुद्ध ने जब घर छोड़ा तो ये पाया कि दुनिया सारी
- 30:45दुख है, कहीं ऐसा कोई मुकाम नहीं। जहाँ तुम्हारा दुख दूर हो जाए
- 30:55चाहे तुम्हारे पास हीरे ज्वारात भरे हों, अम्बार तक तो उताज हों।
- 31:04सोने के हीरे ज्वारात जड़ित तुमने।
- 31:08पोशाक की पेड़ रखी। हजारों हजारों सेवक सेविकाएं दास
- 31:14दासियां अनुचरों की तरह काम करते हैं।
- 31:21आपका एक इशारा और आपकी हर इच्छा पूरी।
- 31:27लेकिन ये सब कुछ होते हुए है ये तो इन्द्र के पास ही है, जो
- 31:33मांगते हैं वो मिल जाता है, लेकिन क्या इन्द्र मुक्ति मांगेगा, मिल
- 31:38जाये नहीं मिलेगा? इन्द्र भी दुखी है।
- 31:44इन्द्र भी भैस से कांपता है। उस उसका शख्स भी हिलता है, जबकि
- 31:50विश्वामित्र बैठता है तप करने के लिए वह ड्रबुक है।
- 31:57अक्सर राजा ड्रबुक। ही होते हैं।
- 32:02वह मुश्किल से मिली गद्दी कोई छीन न ले।
- 32:05और छीनेगा तो अपना करीब ही छीनेगा सबसे ज्यादा निगाह उसकी अपनी
- 32:11करीबी व्यक्ति पर होगी। कहीं ये न छीन लें क्योंकि ये
- 32:15व्यक्ति सब राज़ जानता है। उसी से होता है टेल।
- 32:22तो इन्द्र, कितना? भी शक्तिशाली हो कितना भी सुखी हो
- 32:27बुद्ध सुखी तो बहुत। है और वो सुख सुविधाओं के हैं।
- 32:36ये ध्यान रखना सुख और सुविधाओं में एक फर्क है।
- 32:42तुम जिन्हें सुख कहते। हो वो सुविधाएं हैं, अच्छी पलंग
- 32:48हैं, सोने की टॉयलेट्स हो सकती हैं, सोने के बिस्तर हो सकते हैं,
- 32:55अच्छे डेवलप के पिलोज हो सकते हैं, सुनहरी कारें हो सकती हैं।
- 33:02सोने की पोशाकी तुम डाल सकते हो लेकिन इतना कुछ होते हुए भी अगर
- 33:07तुम्हारा मन ज्वालाओं से जल रहा। है तो फिर उस सोने का कसर था
- 33:14सिंघाशों का कसरथा रात को नींद नहीं आती।
- 33:19परमात्मा ने अपनी सब नियामते खींच में परमात्मा ने नींद दी थी, उसने
- 33:25छीन ली। परमात्मा ने भूख दी थी, उसने छीन
- 33:28ली, परमात्मा ने छेंम दिया था, उसने छीन लिया फिर तुम्हारे ऊपर
- 33:32ले क्या रह गया? सुविधाएं रहेंगी पदार्थों की।
- 33:38ऐसे। व्यक्ति का संतोष खत्म हो जाता
- 33:40है। ऐसे व्यक्ति की तृप्ति खत्म हो
- 33:46जाती है तो कबीर कहते हैं राजा को कभी संतोष नहीं होता।
- 33:57कबीर वैसे ही कोई बात? नहीं बोले कबीर को पता है।
- 34:03रात की नींद गई दिन का चयन किया। भूख गई।
- 34:13जो परमात्मा की। दांत थी।
- 34:17खुशी का स्वर छीन लिए परमात्मा है क्यों?
- 34:20क्योंकि तुमने प्रकृति व्रत काम किया है?
- 34:25प्रकृति चाहती है तुम उसके हुक्म को मानो जहाँ प्रकृति और परमात्मा
- 34:31दोनों को तुम एक समझ लेना जो नास्तिक हों।
- 34:35और प्रकृति समझ लेना जो आंशिक हो, वो ईश्वर समझ लेना समझना ही तो
- 34:41है। कबीर कहते हैं कि तुमने सब को
- 34:56दिया। सुविधाओं के बगले?
- 35:01और तुम उसे सुख कहते हो जैसे कुत्ते की हड्डी का स्वाद कुत्ता
- 35:06चबाता है, हड्डी को उसके मसूड़ों से आता है, खून बड़ा स्वाद लगता
- 35:12है, खून नमकीन होता है, स्वाद लगता है ओके तब वाह क्या बात है।
- 35:20है लेकिन उसे पता नहीं होता कि ये खून उसके स्वयं के शरीर का खून
- 35:26है। उस हड्डी ने जख्म कर दिया मसूड़ों
- 35:30में और यही खून उसकी जीवक के टेस्ट वर्ष को जब लगता है तो वो
- 35:38कहता है बड़ा प्यारा है। बड़ा मीठा, बड़ा, शानदार रसपूर्ण
- 35:42है। झूमने लगता है।
- 35:46ऐसे ही तुम तुम संसार के रसों को भोंकते हुए इन्हें सुख कह दे।
- 35:59जबकि ये सुख नहीं है। ये मात्र सुविधाओं के साधनों के
- 36:04कारण है। एक सुख होता है जब व्यक्ति के पास
- 36:14सब कुछ हो। सब कुछ का मतलब।
- 36:21शयन भी हो, नींद भी हो, भूख भी हो वो ईंटों के बिस्तरों में भी सो
- 36:30जाए। कटे हुए पत्थरों पे भी सो जाए,
- 36:34नींद आ जाएगी, बड़ी गहरी नींद आ जाएगी जो किवाड़ो को बिखा रहे।
- 36:41पांच जाएंगे, पत्थरों को भी खाले पांच जाएंगे।
- 36:46ऐसी भूख लगती, उसको ऐसी नींद आती और जो कभी और जो गृहण नहीं होता,
- 36:53अशांत नहीं होता, जो शांत रहता है, हर वक्त बेहतर रखता है।
- 37:02और तृप्त व्यक्ति अगर ऐसा है तो ऐसा समझ लेना कि वह उस मकान पर
- 37:11पहुंचा हुआ व्यक्ति है। बाहर के लिबासों को मत देखा।
- 37:19फटे हैं, मेले हैं, कुचले हैं। प्रश्न नहीं हुए कपड़ों को मत
- 37:29देखना बहुत से लोग कपड़ों को ही देखते फिरते हैं कपड़ों।
- 37:34से कोई पहचान? नहीं आती के साथ।
- 37:37पहचान आती है आनंद। से सुरती से खुशबू से, जो मज़े से
- 37:45घोड़े बेच के सो जाता है। जो अपने ही कमाए हुए पदार्थों की
- 37:52चौकीदारी नहीं करता रात। को।
- 37:57जो घोड़े बेच के सो जाता है और जो खाता है वह बसम हो जाता है।
- 38:08जब वह चलता है तो हंस की चाल चलता है।
- 38:13कौवे की चाल नहीं मृगटी चाल चलता है मस्ताना।
- 38:21मृग की मस्तानी चार क्यों होती है?
- 38:24कस्तूरी की खुशबू के कारण उसकी कुंटल में खस्तूरी होती।
- 38:28है। भिन्नी भिन्नी खुशबू सी आती रहती
- 38:31है। और।
- 38:32उस खुशबू के कारण मृग की जाल निराली होती।
- 38:37है। हंस की चाल कितनी प्यारी होती है,
- 38:49क्यों होती है? क्योंकि शांत होती है मुझे मेरी
- 38:55शांत है, हंस शांत। ठहरा हुआ है, मृग खुशबू से त्रस्त
- 39:10है, आनंदित है, लेकिन ढूंढता है ये है कहाँ बड़ी प्यारी खुशबू है।
- 39:20अपनी ही उस कस्तूरी। को पाने के लिए दौड़ता है।
- 39:24ऐसी ही तुम हो जो सुगंध तुम्हारे भीतर से आती है, जो आनंद तुम्हारे
- 39:32भीतर से आता है, तुम उसको पाने के लिए बाहर तोड़ते हो, वनों में
- 39:37जाते हो, जंगलों में जाते हो। पहाड़ों पर जाते हो, तप करते हो,
- 39:45उपवास करते हो, साधना करते हो, योग करते हो, आसन करते हो,
- 39:50प्राणायाम करते हो, उसको पाने के लिए जो किंतु नहीं।
- 39:56हो? सुख बुध कहते हैं जहाँ सुख मिल
- 40:09जाए तुम्हें वहाँ ठहर जाना स्वाभाविक तुम।
- 40:12ठहर भी जाओगे। तो बुध ही आरोप हैं।
- 40:17बुध कहते हैं कि संसार दुख है। ठीक भी है।
- 40:25बुद्ध को जैसे ही मुकाम मिला, बुद्ध ने बहुत से गुरु बदले, अनार
- 40:31कलाम बदला फिर और बदले जो प्राणायाम करवातें थे ध्यान
- 40:38करवातें थे साधना करवातें। लेकिन उन्होंने पाया किसी में
- 40:43कुछ। नहीं।
- 40:49फिर उन्होंने सब छोड़ दिया। बहुत ही वृक्ष के नीचे बैठे पीपल।
- 40:59बौद्धी वृक्ष बोर्ड का वृक्ष नहीं था, ये ध्यान रखना पीपल का वृक्ष
- 41:04था, बौद्ध ही वृक्ष से तो कहा गया कि वहाँ बौद्धत्व का जन्म हुआ था,
- 41:10बोध हुआ था। इसलिए उस पीपल के पेड़ का नाम।
- 41:14बौद्धी वृक्ष रखा गया। वहाँ बुद्ध की घटना घटी थी, वहाँ
- 41:23बैठ जाते हैं, फिर व्रत करते हैं, उपवास करते हैं, 49 दिन तक व्रत
- 41:27करते हैं। महलों में खातों बहुत लिया था।
- 41:35तो सोचा कि खा तो बहुत लिया लेकिन खाने से तो मिला नहीं।
- 41:39बड़े स्वादिष्ट पदार्थ खा लिए, लेकिन मिला नहीं भरपूर चैन की
- 41:43नींद सोया लेकिन मिला नहीं। अब जागते ही देख रहे हो भूखे रह
- 41:49के देख रहे। हो क्या बिगड़ता है अगर?
- 41:53वैसे नहीं तो ऐसे तो मिल जायेगा। लेकिन ना ऐसे मिला ना वैसे मिला,
- 42:01ना ज्यादा सोने से मिला, ना ज्यादा लग्ज़रीज लाइफ से मिला और
- 42:07ना ज्यादा कठोर तक से मिला ना जागने से मिला।
- 42:14ना उपवास से मिला, ना भूखा रहने से मिला, ना भोग से मिला ना त्याग
- 42:22से मिला बुद्ध कैसे है मध्य मार्ग ना भोग से मिलेगा ना त्याग से
- 42:30मिलेगा मध्य मार्ग बुद्ध का मार्ग था मध्यम मार्ग।
- 42:38और कृष्ण इस बात का जिक्र करते? है आहार विहार युग का आहार विहार
- 42:51स। बात एक ही हेतु सभी संत उस मुकाम
- 43:01पर पहुंचे जहाँ दुख मिट गया सभी संत उस मुकाम पर दूसरी बार।
- 43:08बोल रहा हूँ। सभी संत उस मुकाम पर पहुंचे जहाँ
- 43:12दुख मिट गया। तो चाहे बुद्ध थे, पतंजलि थे या
- 43:20यज्ञ वेल्क थे या कृष्ण थे या कबीर थे?
- 43:22नानक थे दया, मीरा कोई भी जिसका दुख मिट गया वहाँ पहुँच गया।
- 43:39क्या उस से भी आगे मुकाम है? कोई ये आज के प्रश्न की बात मुझे
- 43:43लगती है क्योंकि उससे आगे रहस्य की बात शुरू होती है।
- 43:50यहाँ तक व्यक्ति का मसला हल हो जाता है।
- 43:54तो अगर हम बुद्ध पे ठहर जाए तो दट इस सुफ्फिसिएंट अगर बुद्ध पे ठहर
- 44:02जाए तो काफी। है सब मिल गया जो।
- 44:08पाना चाहते हैं, लेकिन बात ध्यान में रखना।
- 44:16जो बुद्ध परमात्मा को नहीं मानते, जो बुद्ध अगले जीवन को नहीं
- 44:22मानते, पुनर्जन्म को नहीं मानते, वो बुद्ध स्वयं ही जन्म लेंगे
- 44:29मैत्री के रूप में। कौंसिल आ गए ना कंट्राडिक्शन आ
- 44:34गया लेकिन वो तो कुछ भी कहें। मानें कुछ भी बात ये है कि पाया
- 44:47सभी ने वो ही जो एक ने पाया। कबीर ने वो रसपाया, बुद्ध ने वो
- 44:55रसपाया दुःख विहीनता का रस, नानक ने भी वही पाया, कृष्ण ने भी वही
- 45:02पाया। याज्ञवर्त ने भी बोई, पतंजलि ने
- 45:05भी बोई। कबीर ने बोई सभी ने बोई पाया,
- 45:08मीरा नाची तो उसने भी वही रस। पिया।
- 45:18इस प्वाइंट से गुजरना पड़ता। है, लेकिन इससे आगे कम कुछ मत
- 45:26पूछना क्योंकि इससे आगे पूछना फिर आदि की चर्चा में कभी फिर करूँगा
- 45:33एक बार हम यहाँ रुक जाये। बुद्ध कहते हैं जीवन दुख है और
- 45:40दुख का कारण है क्या अज्ञान और दुख का निवारण है?
- 45:46कैसे ज्ञान और दुख के निवारण का मार्ग है उसको कहते हैं साधना।
- 45:58ये चार बातें कहीं पता नहीं तुम दुखी हो वो तो साफ साफ कहते हो,
- 46:08दुखी हो तो तुम चारबाजी करते हो, जाल बिछाते हो राजनीति के?
- 46:14लोगों को मार के उनकी लाशों के ऊपर चढ़ जाते हो, क्योंकि
- 46:18तुम्हारी कुर्सी। उर्सी वो होती है।
- 46:22एक लाश से काम नहीं चलता, दूसरी, तीसरी चौथी।
- 46:25तब तक तुम बन्दों को मारते रहोगे जब तक तुम अपनी गलती पे नहीं
- 46:30बैठोगे क्योंकि गद्दी थोड़ी ऊंची है।
- 46:36लेकिन तुम सुखी होना चाहते हो? बुद्ध ये कहते हैं बुद्ध को
- 46:43संक्षिप्त रूप से कहा जाये तो बुद्ध यही कहते हैं कि मानव दुखी
- 46:49है, जीवन दुखी है, संसार दुख है। दुःख का कारण है तुम्हारा अज्ञान,
- 46:57दुख को मिटाने का ढंग है अज्ञान का नश और उस ढंग को कहते हैं
- 47:06साधना खुद यहाँ खत्म कर देते हैं बात को।
- 47:15और बहुत से लोग जो शिष्य हैं और पातांजलि के हैं, चक्रवल की हैं,
- 47:22कृष्ण की हैं, कबीर की हैं, नानक की हैं, मीरा की हैं या बुद्ध की
- 47:29हैं, वह आपस में जागरूक हैं। झगड़ने का कोई कारण?
- 47:32है। क्योंकि इन्हें कुछ पता नहीं।
- 47:37इनकी बातें शास्त्रार्थ कहलाती हैं।
- 47:40शास्त्रार्थ का मतलब जो वास्तव में कुछ जानता नहीं है, लेकिन
- 47:44शब्दों की बहस में उलझा रहता है, खुद भी और दूसरे को भी उलझा देता
- 47:48है। मैं शंकर को इस श्रेणी में लगता
- 47:50हूँ। क्षमा करना वैसे मेरा कसूर कोई
- 47:56नहीं क्यों करेगा कोई शस्त्रार्थ जब किसी को पता चल गया तो उसका
- 48:07कोई और छोड़ दे। शब्दों में आतन शब्दा तीर्थ है वो
- 48:13अखरा नलों अखर जेड़ा बियॉन्ड वार्स उन शब्दों की लड़ाई में वो
- 48:18पड़ेगा क्यों? जब उसे पता है कि एक का झंडा सबसे
- 48:24ऊंचा है। और वो वृहद वह विराट, वह विशाल
- 48:29परमात्मा एक है फिर तुम अपना झंडा अलग से क्यों उठाओगे?
- 48:37क्या तुम परमात्मा से बड़े होने का यत्न करते हो?
- 48:41बहुत से राजनीतिज्ञ हैं जो अपने आपको अवतार घोषित करने के।
- 48:46जिद पे अड़े हुए थे, अब भ्रम टूटा।
- 48:48उनका उनकी इच्छा थी। कि उनको अवतार घोषित कर दिया जाए,
- 48:56लेकिन घोषणा करने से। किसी मुर्गे को घोषित कर दिया जाए
- 49:02कि वो हंस बन गया, क्या वो हंस बन जाएगा?
- 49:08घोषित करने से तो कुछ नहीं होता। होने से होता है जो कुछ होता है
- 49:14मुर्गा वास्तव में हंस बन जाए तो हंस हुआ।
- 49:18घोषणा करने से कुछ। नहीं होता।
- 49:24यहाँ सब आते हैं इस स्थल पर सभी आते हैं जिससे मैं बुध का तल कहता
- 49:29हूँ। बुध का तल क्यों कहता हूँ कि बुध
- 49:32यहाँ आके रुक जाते हैं, महावीर नहीं रुकता।
- 49:37महावीर से आगे निकल पड़ते हैं, इसलिए बुद्ध को मात्र 6 साल लगे।
- 49:44महावीर को 12 साल से ज्यादा लगे महावीर को 12 वर्ष, छह महीने।
- 49:5615.5 दिन लगे अगर बिलकुल एक्यूरेट।
- 49:59देखा जाए तो दोपहर। वक्त उन्हें ज्ञान।
- 50:03होगा। 12 वर्ष के छह महीने 15 दिन और
- 50:09दोपहर की विला 15.5 दिन संभल। ये बिलकुल सही सही वक्त है।
- 50:17करीबकरीब बुद्ध से दुगना उसमें ब्रह्मचर्य भी था, तप भी था,
- 50:24साधना भी थी, मौन भी था, सब बीच में ही आ गया।
- 50:31इतने समय में उन्हें। कैवल्य की प्राप्ति।
- 50:33हुई। बाकी छः सालों ने क्या किया?
- 50:386 साल में वो भी वहीं पहुँच गए थे।
- 50:43दोनों की तीव्रता वही थी, उत्कंठा वही थी, गति वही थी।
- 50:47करीब करीब उतने ही वक्त में दोनों पहुँच गए थे।
- 50:52उत्तर। पे।
- 50:55फिर महावीर को 6 साल और क्यों लगे?
- 51:01क्योंकि महावीर उससे आगे चल रहा है?
- 51:06इस प्रसंग को हम नहीं छोड़ दें, बस इतना सा तुम्हें इशारा करना
- 51:11चाहता था। के बुद्ध से आगे भी मार्ग है उसे
- 51:16रहस्य का मार्ग कहते। हैं जिसपे जागे बल के निकलते हैं
- 51:23उपनिषद जीस पे कृष्ण निकलते हैं। और भी है।
- 51:36लेकिन बुध ने उसे खंगालन इसलिए बुधने का परमात्मा है।
- 51:44पुलिस से बात चल भी जाएगी, कोई फर्क नहीं।
- 51:46पड़ता। क्योंकि जहाँ दुख का नाच में हो
- 51:49जाता है। आम गृहस्थी व्यक्ति यही तो चाहता
- 51:53है 99.9% लोग यही चाहते हैं हमारे दुखों का नाश हो जाए कहीं पॉइंट
- 52:021% लोग चाहते हैं दुखों के नाश से आगे।
- 52:11उस शाश्वत में या उस रहस्य में उतरना है।
- 52:16इसलिए रहस्यवादी बहुत ज्यादा नहीं मिलेंगे।
- 52:18तुम्हें कोई बरेला, बरला मिलेगा। बुद्ध के तल पर पहुंच हुए बहुत से
- 52:27लोग मिलेंगे। रहस्यवादी व्यक्ति कोई भरला बदला
- 52:32होगा बुद्धि का तल, हृदय का तल, नीचे, यी तल, बुद्ध, बुद्ध,
- 52:46ज्येष्ठ तल पर हैं। अब सुनना बात और तुम्हारे प्रश्न
- 52:49का जवाब अब सुर गोवा से। उस तल पर संकल्प प्रगाढ़ होता है।
- 53:03प्रगाढ़ का अंत पूर्ण पूर्ण पूर्ण।
- 53:09इस स्तर पर आया हुआ व्यक्ति चाहे तो किसी को आशीर्वाद दे सकता है।
- 53:15चाहे तो किसी को शराब दे सकता है। बस यही आती हैरानी होती।
- 53:21है। पहुँच जाते हैं या बुद्ध भी?
- 53:30लेकिन उनके ऊपर व्यक्ति थूक जाता है, वो शराब नहीं देते, पहुँच
- 53:40जाते हैं यहाँ पर दरबाश भी लेकिन थोड़ा सा इतर उतर हो जाए तो शराब
- 53:49दे देते हैं। कारण क्या है?
- 53:52क्योंकि यह शरीर त्रिगुण युक्त है।
- 54:00बुध करीब त्रिगुण युक्त शरीर से परे रहते हैं इसलिए इतनी शांत और
- 54:05शीतल नजर आते। हैं।
- 54:10उनका ज्यादा वक्त अपने तल पर बीतता है।
- 54:14यहाँ कोई दुख नहीं, कोई रोग नहीं, कोई कष्ट नहीं, कोई दृढ़ता नहीं,
- 54:21कोई अभाव नहीं जहाँ सब है भरा बुरा है कोई कमी नहीं तबुद्द कहते
- 54:29हैं। बस परमात्मा की कोई जरूरत नहीं।
- 54:31ठीक हुई है। यहाँ पर आने वाले व्यक्ति को जब
- 54:36कोई अभाव नहीं, कोई कष्ट नहीं, कोई दर्द नहीं, कोई दुख नहीं तो
- 54:41परमात्मा की आवश्यकता क्या है? लार्ज और सफीशियंट नियम काफी है,
- 54:48बिल्कुल ठीक। है।
- 54:50यहाँ आकर नियम अपना काम करेगा। ज़रा भी गलती नहीं है।
- 54:56बुद्ध के मार्ग तक प्रत्येक व्यक्ति को आना ही पड़ता है।
- 55:03इट्स ए नेसेसरी स्टेप। सभी आते हैं यहाँ तक लेकिन बुद्ध
- 55:11के हार जाते। हैं।
- 55:14ठहरते क्यों हैं? थोड़ा सही बता दो करुणा अवश्य अगर
- 55:20आगे जाऊंगा तो पता नहीं कितना मार्क?
- 55:22है। मार्क वो जानते हैं, अच्छी तरह से
- 55:25क्योंकि जो वहाँ पहुँच गया एक जीने से पर्दे के पीछे।
- 55:29वह मार्ग दिखेगा। अभी रास्ता और है लेकिन क्योंकि
- 55:34समस्याएं हल हो गई, समाधान हो गया, दुःख दूर हो गया, सब दूर हो
- 55:41गया। जो कष्टकारी था तो यहाँ ठहरना
- 55:44उचित होगा। वो करोड़ों करोड़ों जलती हुई
- 55:48आत्माओं को अगर मैं उठ गया एक अकेले व्यक्ति ने त्याग कर दिया
- 55:56तो करोड़ों लोगों को शांति मिलेंगे और वो त्याग कर देते हैं,
- 56:02वो आगे जाने की चेष्टा नहीं करते हैं।
- 56:04वो कहते हैं। बस मैंने पा लिया।
- 56:08मैं इसका प्रचार करूँगा। इसका प्रसार करूँगा क्योंकि मुख्य
- 56:13दुविधा ही है कि संसार दुख है और दुख का हल मेरा हो गया।
- 56:21आगे क्या है, इसको मैं नहीं खंगाल।
- 56:26और देखो, मैं तुम्हें एक बात। बताऊँ।
- 56:28अगर कोई न खंगाले तो बुद्ध से आगे की यात्रा व्यक्ति की यात्रा है
- 56:33भी नहीं। बुद्ध से आगे की यात्रा परमात्मा
- 56:37की यात्रा है, खुद ही चल लेगा, लेकिन बुद्ध को एक बार इस शरीर
- 56:42में जरूर आना पड़ेगा। फिर परमात्मा अपनी चाल से चलेगा
- 56:47बस यह। मजबूरी रह गई उसके लिए।
- 56:50वैसे शुद्ध है, बुद्ध है, शांत है, शीतल है, ठहरा हुआ है, भटकाव
- 56:56नहीं, कोई आग नहीं, कोई द्वंद नहीं।
- 56:59बुद्ध शीतल है, बुध आनंद में है। लेकिन बुध से आगे जो मार्ग हैं वो
- 57:07रहस्यत्मक है। लोग वहाँ क्यों जाते हैं?
- 57:12लोग जाते हैं जो भी करना का एक कारण है बुध वहाँ उठ जाते हैं ये
- 57:18भी करने का एक कारण। है।
- 57:21आप दोनों को समझिये। लेकिन प्रश्न लंबा हो जाएगा।
- 57:27बुध करुणा के सागर हैं। वो कहते हैं लोगों का दुख तो मिटा
- 57:30लें, दुनिया ही दुख है, संसार ही दुख है और इस दुख को मैं समाप्त
- 57:37कर दूं क्योंकि मैं राज़ जानू गया हूँ तो ये काफी है।
- 57:42तो भाग पड़ते हैं संसार में सारनाथ में अपना प्रथम प्रदर्शन
- 57:46करते हैं और सारी उम्र यात्रा पर रहते हैं।
- 57:52कुशीनगर में आकर प्राण त्याग देते हैं 80 वर्ष की उम्र में।
- 58:0036 की उम्र में ज्ञान को प्राप्त। हुए।
- 58:0480 की उम्र में उन्हें प्राण तगा प्राण भी जाएगा।
- 58:07कुन्तु लोहार ने उन्हें जहरीला मशरूम।
- 58:10खिला दिया था। लेकिन उस तकदीफ से उन्हें ज़रा भी
- 58:17दर्द। नहीं हुआ है।
- 58:20शरीर को दर्द होता रह, वो शरीर को दर्द होते हुए देखते रहे।
- 58:27अब मैं एक एक बात को बड़े गहरे से समझा रहा हूँ मेरा चूकना टूट गया
- 58:31था। मैंने वहाँ से एक वीडियो डाला
- 58:35जनता के हित के लिए। जिज्ञासुओं के हित के लिए
- 58:42पिपासुओं के हित के लिए कि देखो चूकना टूटा हुआ है, बड़ा दर्द है
- 58:48भारी दर्द भी था, लेकिन दर्द अलग है और मैं अलग।
- 58:54हूँ। दर्द शरीर में है और मैं अपने आप
- 58:56में हूँ। दोनों की स्थिति अलग है, दर्द
- 59:02शरीर में है, मैं आनंद में हूँ क्योंकि मैं अपने आप में हूँ और
- 59:07मैं शरीर नहीं हूँ, मैं वहाँ से व्याख्यान किया तो शायद।
- 59:12वीडियो आपको आज भी मिल जायेगा मिल जायेगा।
- 59:19अब प्रश्न के जवाब में फिर आ जाए। जब दोनों ही के तल पे पहुंचते
- 59:26हैं, बुद्ध के ऊपर थूक जाता है, व्यक्ति के प्रतिकार नहीं करते।
- 59:34और टेढ़ी आँख से झाँक लो दुर्वा सब विश्राम देते हैं।
- 59:42देखिए वहाँ पहुंचने वाले के पास धैर्य और संकल्प तो होगा असीम, वह
- 59:52अगर कहेगा मर जाओ तो मर जाएंगे। यह ताकत तो उससे बहुत ऊपर ले
- 1:00:01तल्पे भी आ जाती है। फ्रीद को भी मिल गई थी फ्रीद जब
- 1:00:07वृक्ष के नीचे बैठे। चिड़िया चिल्ला रही हैं, उसके
- 1:00:11ध्यान में बाधा पड़ रही है। फ्रीद कहने लगा अरे चिड़िया और मर
- 1:00:15जाओ चिड़िया मरने। यह है संकल्प की ताकत तुम्हारे
- 1:00:22संकल्प की ताकत प्रकृति तुम्हारी गुलाम है।
- 1:00:26मैंने पिछले प्रवचनों में कहा है। प्रकृति को मानना पड़ता।
- 1:00:30है। इसलिए मैं कहता हूँ उस तल पर गए
- 1:00:34हुए व्यक्तियों को छेड़छाड़ मत करो।
- 1:00:38अगर वो बुद्धि जैसा है तो जल जाएगा, वो कहेगा कोई बात नहीं,
- 1:00:44शरीर के ऊपर थूका, मेरा क्या बिगड़ा।
- 1:00:48लेकिन अगर अगर दुर्वासा जैसा है तो तुम्हारा बुड़ता बना लो।
- 1:00:58दुर्वासा दुर्वास दोनों के सरूर शरीर तीन गुणों से ही झुकते हैं।
- 1:01:07बुद्ध का हो, चाहे दुर्भाषक हो, शरीर की संरचना तो वही होती हैं,
- 1:01:12वही ओसोफकस, वही स्टमक, वो ही डूडिनम, वो ही लिवर, वो ही
- 1:01:20किडनिस, वही गाल ब्लैडर, वही पैंक्रीआस सब कुछ वही तो है।
- 1:01:28ना जाकी बल का बदला ना बुद्ध का बदला, ना ही इसका बदला दूसरा देता
- 1:01:40है। सब के भीतर वो ही यंत्र लगे हैं।
- 1:01:45और यह प्रकृति त्रिपुण से सम्पन्न है कोई व्यक्ति उस त्रिगुणात्मक
- 1:01:53वृत्ति से चिपट जाता है, कोई व्यक्ति उस त्रिगुणात्मक वृत्ति
- 1:01:58से चिपटता नहीं, दूर बैठा रहता है, दुर्भाषा चिपट जाती है।
- 1:02:04दर्भाषा के ऊपर को थूक के देखें दुर्भाषा बुढ़ता भी न देती है
- 1:02:15दरवाषा से देवता भी कहानियों हैं सब इनपे ज्यादा विश्वास मत करना
- 1:02:22लेकिन ये? इंगित थे संकेत थे सिम्बोलिक
- 1:02:26रेप्रेसेंटेशन्स अब्रीविएशन ऑफ स्पर्चुअलिस्म एक अतल है।
- 1:02:33ऐसा। जहाँ आप संकल्प करोगे वो ठीक हो
- 1:02:38जाएगा। तो फरीद की कहानी मैंने सुनाई,
- 1:02:43चिड़ियों मर जाओ, चिड़ियों जी जाओ तो जी गईं तो फरीद ने सोचा मैं तो
- 1:02:48पहुँच। गया।
- 1:02:50चलो आगे की कहानी लंबी हो जाएगी वैसे मैंने पहले भी।
- 1:02:53सुनाई। तो क्या करते हैं दरवाजा?
- 1:03:02दुर्भाषा जब किसी से कुपित होते हैं, क्रोधित होते हैं, वो तो
- 1:03:07बुद्ध ही सकते हैं, लेकिन बुद्ध का स्वभाव।
- 1:03:10शांत है। दुर्भाषा का स्वभाव शांत नहीं है,
- 1:03:16दुर्भाषा का स्वभाव गर्म है, आपने देखा कोई चीज़ आप खाते हो?
- 1:03:21हमारे बुजुर्ग कहते हैं कि इसकी तासीर ठंडी है, कुछ चीजें होती
- 1:03:26हैं, एनर्जी उनमें होती हैं, प्रोटीन होते हैं, कार्बोहाइड्रे
- 1:03:31होता है, फैट होते हैं, विटामिन होते हैं लेकिन हमारे बुजुर्ग
- 1:03:35कहते हैं कि इसकी तासीर गर्भ है। इसकी तासीर ठंडी है।
- 1:03:41ऐसे ही आदमी होते हैं बुद्ध की तासीर ठंडी और दरवाजे की तासीर कर
- 1:03:51वही तुम इसके ऊपर थूकोगे तो पता नहीं क्या कर देगा, क्या कर देगा?
- 1:03:56इसने बड़े से शराब पीए। इसने विष्णु की घर वाली।
- 1:04:01लक्ष्मी को सिराते जा तू समुद्र में डूब।
- 1:04:04जा। डूब के देखिए कहानी है फिर मैं
- 1:04:09आपको बता दूँ, इनपे कोई किंतु परन्तु मत करना इसके भीतर कुछ ही
- 1:04:15छिपे हुए तथ्य हैं। ये वो जलेबी है जिसके भीतर।
- 1:04:19है। मैं उन रस्सों को उगाड़ रहा हूँ,
- 1:04:22सिर्फ और बार बार आपको आगाह। कर रहा हूँ।
- 1:04:25क्योंकि तुम चिपटते बहुत जल्दी हो।
- 1:04:28इन मूर्खों ने कृष्ण भगवान को लड्डू को पार बना दिया।
- 1:04:34परम ने छेत्र में शोरूम को परम जड़ बना लिया।
- 1:04:40हम इनसे कोई क्या उम्मीद करेगा कि कल को यह साइंटिस्ट बन जाएंगे?
- 1:04:46ये लड्डू गोपाल ही रहेंगे बल्कि गोबर गणेश हो जाएंगे।
- 1:04:50सही पूछो तो ऐसे हिंदुस्तान में ऐसे मूड पैदा हो गए हैं।
- 1:04:59और देन किसकी हमारी आज की राजनीतिक पार्टियों की या तथाकथित
- 1:05:06स्वयंसेवक पार्टियों की? उन्होंने ऐसे गंदे संस्कार दे दिए
- 1:05:12कि बच्चों की मति तो हर रे जैसे और आज सब जगह।
- 1:05:19ऐसे ही कलयुग का पहरा है। इसे कलयुग कहते हैं।
- 1:05:24सभी मूर्ख कटे हुए हैं। सभी की वासनाएं उन वासनाओं को
- 1:05:30पूरा कर दो, वो ठहर जाएंगे। ट्रंप ऊषा कूद कर रहे हैं।
- 1:05:37काहे को कर रहे हैं? आपको पता है उसको नोबेल का शांति
- 1:05:41पुरस्कार दे दो वो ठर के बैठ जायेगा घर पे बस यही चाहिए थोड़ी
- 1:05:46थोड़ी अनिका अक्षय होती है आदमी की किसी को भारत रत्न दे दो किसी
- 1:05:51को विष्णु का अवतार घोषित कर दो, वह शांत होके बैठ जायेगा गद्दी
- 1:05:55छोड़ देगा चलो बस ठीक है। हमारी इच्छा पूरी इतनी सी इच्छाओं
- 1:06:00के कारण अब हजारों लाखों लोगों को तंग भी करते हो, नियमों में
- 1:06:05परिवर्तन भी करते हो, बदल भी देते हो, मार भी देते हो, दम भी गौड़
- 1:06:10देते हो, महंगाई भी कर देते हो, कर्जदार भी कर देते हो बात तो
- 1:06:14तुम्हारी। शूद्र अंतकाक्षाओं की बसनाओं की
- 1:06:18होती है बस वो पूरा हो जाए सिर्फ लोग।
- 1:06:24कहें कि हाँ। मेरी शादी 56 इंच की है।
- 1:06:28होती नहीं है, सिर्फ लोगों से ही कहलवाना है।
- 1:06:33श्रेय लेने के लिए आप कुछ भी कर सकते हो।
- 1:06:41ऐसी मानसिकताएं लोगों की हो गई है।
- 1:06:44शीतल व्यक्ति है, बुद्ध उसके ऊपर थूक जाओ, अपना रुमाल निकालेगा,
- 1:06:50रुमाल निकाल के पूछ लेगा, कुछ और भी कहना है ये तो मैं समझ गया।
- 1:07:03ऐसे हैं हम अरे अगर तुम। थूक थूकोगे दरवाज़ा के ऊपर।
- 1:07:10तो पता नहीं क्या करते हैं? चलो ठीक भी हो जाएगा कहानियों हैं
- 1:07:17बहुत सी कहानियों। 12 है शराब जो दुर्गा सर ने दिए
- 1:07:25वो बड़े मशहूर है लेकिन नाम क्या? घना बस आपको मैंने बुनियादी तत्व
- 1:07:29समझा दिया संकल्प घना, बिल्कुल उसी मात्रा में जितना के भीतर।
- 1:07:36है। देखिये बुद्ध के पास आ जाती है
- 1:07:39कोई इससे मेरा पुत्र जवान मर गया। इसको जनता का बुद्ध नहीं करेंगे,
- 1:07:45कर सकते हैं। आप कहोगे कि हमारे बुद्ध करना
- 1:07:50देते हैं, इतना करना मान रहा है, नहीं करेंगे।
- 1:07:52अब वो जानते हैं कि शरीर मरण धर्मः है।
- 1:07:58अगर एक को मैंने जिंदा कर दिया तो फिर ईसा की तरह उलझा दोगे तुम और
- 1:08:06आगे आके ईसा उलझ ही गए। बुद्ध नहीं उलझे, इन बातों में
- 1:08:11बुद्ध जानते हैं। फिर तुम चमत्कार देखने के योग्य
- 1:08:15रह जाओगे। बाबा बागेश्वर की तरह होता कुछ
- 1:08:19नहीं है शरीर हाथ की सफाई फिर तुम कहोगे बाबा चमत्कार दिखाएं,
- 1:08:25परमात्मा होता है तो अरे भाई परमात्मा होता है तो इतना बड़ा
- 1:08:29चमत्कार देखो। तारे गृह नक्षत्र, आकाशगंगाएं,
- 1:08:40यूनिवर्स ब्राह्मण ये चमत्कार नहीं है।
- 1:08:46क्या? अगर मैं यहाँ से हवा में से
- 1:08:49चुन्नी ले आऊ। दिखा दू यह लोचारण वो चमत्कार
- 1:08:53होगा। इतना बड़ा चमत्कार तुम्हे दिखा ही
- 1:08:57नहीं पड़ता, लेकिन बहुत ऐसा करते नहीं कर सकते।
- 1:09:04हैं। क्योंकि बुद्ध बिल्कुल उसी तल पे
- 1:09:09है। दरवाषा भी कर सकते हैं।
- 1:09:11हम दरभा ने किया अगर किसी को श्राप दिया तो किसी को वरदान भी
- 1:09:16दिया। 12 शराब ऐसे हैं जो कि बड़े
- 1:09:26विख्यात। हैं।
- 1:09:27लेकिन हम बात। काम ही करेंगे संकल्प जितना
- 1:09:32हनिमून। होगा।
- 1:09:34उतने ही गहरे तल पे आप पहुँच जाओगे और संकल्प बुद्धि पे आती
- 1:09:39कमजोर होता है और तुम्हारे बी के वाले और वाले ये संकल्प सिखाते
- 1:09:43हैं तुम्हें बुद्धि से लेना थोड़ा सा।
- 1:09:50उससे थोड़ा सा बदलाव होता है, होता है लेकिन थोड़ा सा होता है,
- 1:09:55हृदय के तल से जाओगे जैसे भक्त लोग हैं, भक्त कोई कुछ कह दे,
- 1:10:02उसका तल ज्यादा गहरा है और ज्यादा तल गहरे का मतलब ज्यादा शंकल।
- 1:10:08और गहरे का मतलब बहुत गहरा अंतिम गहराई पे आ जाना जहाँ बहुत ही चले
- 1:10:14गए थे वह संकल्प बिल्कुल पूर्ण वह पूर्ण हो जाता है फिर उससे आगे
- 1:10:23मुकाम आता है रहस्य का। फिर पूर्ण में से पूर्ण को निकाल
- 1:10:27लिया जाए। उपनिश्चितों की बात।
- 1:10:29शुरू होती है। पूर्णश्य पूर्ण माताएं पूर्ण में
- 1:10:32वह शिष्यते यह समझ में नहीं आती। उससे पहले के बाद बुध तक तुम समझ
- 1:10:37जाओगे। बुध से आगे के बाद यज्ञ बल की बात
- 1:10:41तुम नहीं समझ सकोगे और बहुत से मूर्ख बैठे हैं।
- 1:10:45जो उपनिषदों को समझा रहे हैं, जब वो भाई समझ में नहीं आएगा, कृष्ण
- 1:10:50समझ में नहीं आएगा, तुम कृष्ण की व्याख्या करोगे, अपने ढंग से
- 1:10:54करोगे और वो गलत होगी। लेकिन लोग बैठे हैं।
- 1:11:03अष्टावक्र गीता की व्याख्या करते। हैं।
- 1:11:07व्याख्या नहीं हो सकती। सिर्फ थोड़ा सा इशारा हो सकता है
- 1:11:11और वो भी उस स्तर पर जाकर हो सकता है जिन लोगों ने उस स्तर पर जाने
- 1:11:17की कोशिश की वक्त ही नहीं लगाया। खाली लम्हों को निकाला ही नहीं
- 1:11:25सदा ही पढ़ाई में, कॉम्पिटिशन में और कुर्सियों को पाने और छोड़ने
- 1:11:31में व्यग्र रहे। बताओ उन्होंने कब कब किया, कब
- 1:11:34खाली लम्हे आए और कब वह अपने भीतर उतरे नहीं उतरे, बस सिर्फ श्रेय
- 1:11:41ले ना ही इनकी। इच्छा हो गई है क्या मन खड़ा कर
- 1:11:48लें, संस्था बना लें, संस्था के लिए दान करो, संस्था का पोलियो हो
- 1:11:54गया है, संस्था के हाथ मजबूत करो, हंसो।
- 1:12:02उस तल पर पहुंचा हुआ व्यक्ति जो कह देगा सत्य हो नेष्कर्ष रूप में
- 1:12:09वीडियो बहुत लंबी हो गई है मेरी दृष्टि में सवा घंटे की।
- 1:12:13वीडियो हो गई है। उस तल पर गए हुए व्यक्ति सेखल वाट
- 1:12:18मत करो, छोड़ छोड़ में। ना मजाक में, ना ही परीक्षा लेने
- 1:12:25के लिए तुमने क्या लेना है तुम माने बैठे हो परमात्मा नहीं है तो
- 1:12:29मान लो कौन कहता है तुम्हें क्यों परमात्मा है?
- 1:12:35अगर कोई कहता है तो कम से कम वो डिक्टेटर तो है नहीं, वो कहता है
- 1:12:39भाई मैंने देखा। तुमने मानना है मानो तुमने नहीं
- 1:12:43मानना है तो मत मानो वो कोई तानाशाही की तरह तुम्हारा गला
- 1:12:48नहीं दबाता कि मानो नहीं वो ऐसा नहीं करता।
- 1:12:52कभी भी संत व्यक्ति तानाशाह नहीं होता, डिक्टेटर माइंड नहीं होता।
- 1:13:00अपना अनुभव करेगा। तुम्हें कुछ समझाता है तो समझ लो
- 1:13:05नहीं, समझाता है तो कोई बात नहीं, जैसा तुम समझना चाहते हो वैसा समझ
- 1:13:10लो। पूछा कि रहस्य क्या है?
- 1:13:17रहस्य मैंने आपको समझा। दिया।
- 1:13:20और जो सच्चा रहस्य हैं वो तो मैं अभी नहीं समझा पाया क्योंकि वो
- 1:13:26इससे आगे शुरू होता है। बुद्ध बिल्कुल रहस्य और स्वै की
- 1:13:31सत्ता के बिल्कुल कौर पे खड़े हैं किनारे।
- 1:13:35पे खड़े हैं। जहाँ बुद्ध ठहर गए, बिल्कुल अंतिम
- 1:13:39पड़ाव है उस संसार से परमात्मा तक का अब यहाँ से परमात्मा की सीमा
- 1:13:46शुरू होती है आगे परमात्मा का व्याख्यान जिसे हम रहस्य कहते हैं
- 1:13:53ओके अभी फिर बताऊँगा। मुश्किल सब्जेक्ट है, लेकिन कोई
- 1:13:58पूछेगा तो अवश्य। बताऊँगा।
- 1:14:02लेकिन तुमने पूछा कि इतने जो इसने वरदान भी दिए और इतने शराब पी दिए
- 1:14:14दुर्वासा ने? इसका रहस्य खोलिए वो मैंने खोल
- 1:14:19दिया। जहाँ तक खोला जा सकता है यार जहाँ
- 1:14:23तक जरूरी है नहीं तो वीडियो बहुत लम् भिजवाएगी वीडियो 3 घंटे की हो
- 1:14:26जाएगी। अब मैं ठीक हूँ।
- 1:14:341 दिन थोड़ी सी दुर्बलता आ गई थी। मैंने कहा चलो आराम कर लो।
- 1:14:42ये है काल उस तल पर गए हुए व्यक्ति को छेड़छाड़।
- 1:14:49मत करो। तुम्हें कुछ मिलेगा नहीं।
- 1:14:54वो तुम्हे कुछ कहेगा नहीं, तुम उससे खुरा बात मत करो।
- 1:15:01तुम बुध के ऊपर थूक सकते हो। वो बड़े शीतल है लेकिन दरवाज़ा के
- 1:15:08ऊपर नहीं थूक सकते। वो तुम्हें लवे नहीं लगने देगा।
- 1:15:15वो तुम्हारा कुछ अहित भी कर सकता है।
- 1:15:19वैसे अहित नाम की चीज़ इस धरती पर होती नहीं।
- 1:15:22मैटर कैन नीदर बी क्रिएटेड नॉर कैन बी डिस्ट्रॉयड ये एक नियम है।
- 1:15:29लेकिन उस हिसाब से जो मैं बोलता हूँ, ये ढांचा तो स्कैटर हो गया
- 1:15:34ना? पदार्थ नहीं मरता मैटर नहीं मरता,
- 1:15:40ये सारे अणु नहीं मरते ये ठीक, लेकिन ढांचा तो मरता है ना?
- 1:15:47यह ऑपरेटर्स तो खंडर जाएगा और तुम इस ऑपरेटर्स को ही स्वयं माने
- 1:15:52बैठे हो जब तक तुम इस ऑपरेटर्स से मुक्त न हो जाओ इस उपकरण से मुक्त
- 1:15:58न हो जाओ तब तक तो बचाओ नहीं से बचाओगे ही तुम बचाओगे भी?
- 1:16:06क्योंकि तुम इसे अपनाओ न समझते हो ये फर्क है।
- 1:16:15भूत के ऊपर कोई थूक जाता है, पहुंचे वो भी वहीं है, उतने वरदान
- 1:16:20भी दे सकते हैं। वह मृत को जिंदा भी कर सकते हैं।
- 1:16:23और ऐसा नहीं किया पहुंचा वो भी वहीं था।
- 1:16:30पतंजलि भी कर सकते हैं, यज्ञ बल भी कर सकते हैं।
- 1:16:33कृष्ण भी कर सकते हैं। नहीं करते अपनीअपनी मौज है, कर
- 1:16:39सकते। हैं।
- 1:16:41फिर किंतु परन्तु का प्रश्न मत उठाना, लेकिन यह सत्य है कि वह कर
- 1:16:48सकते हैं नहीं। करते तो नहीं करते, संत है, उनकी
- 1:16:53मौज है जैसा सारा इसका विश्लेषण बढ़े।
- 1:17:01सूक्ष्म और सरल शब्दों से इसके आगे की व्याख्या अगर कोई यहाँ कोई
- 1:17:07प्रश्न रह गया हो तो मुझे पूछ ले कोई व्यक्ति नहीं, तो फिर मैं
- 1:17:14इससे आगे क्या शुरू होता है? वो है रहस्य की दुनिया।
- 1:17:19काफी वरदान तो मैंने तुम्हें बता भी दिया रेहासे की दुनिया का
- 1:17:23लेकिन अभी बहुत परतें खुल रही हैं, शेष हैं, बहुत परतें खुल रही
- 1:17:29हैं, शेष हैं आखिरी शब्द कैसा हुआ?
- 1:17:33मैं अपनी शर्म लूँगा और आपसे इजाजत चाहूंगा।
- 1:17:37न्यूटन मरने लगा। उसके शिष्य बोले, हमारे लिए कोई
- 1:17:42उपदेश आप तो जा रहे हैं, पिता में कोई अंतिम शब्द हमारे लिए चार बोल
- 1:17:49दो। आपने इतनी खोजें कि अब भौतिकी के।
- 1:17:57आप विज्ञान के विश्वमपिता। में।
- 1:18:02कोई हमारे लिए चार शब्द हो जो हमारे लिए एक बहरीन का काम कर
- 1:18:08सके। मार्गदर्शन की तरह दीपक का काम
- 1:18:11कर। सके।
- 1:18:13तो नोट न बोले मुझे विश्वमपिता में न करो।
- 1:18:17आई एम नॉट फादर ऑफ साइंस नॉट फादर ऑफ इन्वेंशन्स, आई हैव कलेक्टेड
- 1:18:25ओनली ए फ़्यू पावर ऑन दी शीशोर व्हील दी ओशन्स ऑफ नॉवलिस्ट विल
- 1:18:30रिमैन अनेक्सप्लोएटेड इतने से समुद्र हैं?
- 1:18:37जो दिखाई पड़ते हैं उनमें से एक समुद्र के किनारे पर खड़ा।
- 1:18:42खड़ा। मैंने कुछ कंकड़पत्थर चुने।
- 1:18:47आई हैव कलेक्टेड एपी पेपल्स ऑन एसी शोर, वाइल्ड ऑप्शन्स ऑफ नॉलेज
- 1:18:53विल रिमैन अनेक्सप्लॉडेड। जब के बहुत से समुद्र ऐसे भी हैं
- 1:19:00जो कि अभी अज्ञात। हैं, उनका पता ही नहीं कितने हैं।
- 1:19:08इतना कहते हुए वो दम तोड़ गए हैं।